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A+ कैटेगरी का गैंगस्टर, हुलिया बदलने में माहिर है मूसेवाला मर्डर केस का मास्टरमाइंड

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गोल्डी बराड़, लॉरेंस बिश्नोई, सचिन (मनकीरत औलख का मैनेजर), जम्मू भगवानपुरिया, अमित काजला, सोनू काजल और बिट्टू, सतेंदर काला और अजय गिल। ये उन लोगों के ही नाम है जिन्होंने, पंजाब के निवासी व गायक सिद्धू मूसेवाला के हत्यारों की मदद की है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की गिरफ्त में मौजूद बदमाश शाहरुख ने पूछताछ में बड़ा दावा किया है। उसने स्पेशल सेल को बताया कि सिद्धू मूसेवाला को मारने का काम (सुपारी) गैंगस्टर गोल्डी बराड़ और लॉरेंस बिश्नोई की तरफ से उसे दी गई थी। बहरहाल उन्होंने पहले भी सिद्धू को मारने की कोशिश की थी लेकिन तब सुरक्षाकर्मियों और सख्त सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर उनका प्लान पूरा नहीं हो पाया था। गौरतलब है कि पंजाबी सिंगर सिद्धू मुसेवाला की हत्या का मास्टरमाइंड गोल्डी बरार कैसा दिखता है? उसका असली नाम आखिर है क्या? तथा कनाडा में बैठकर पंजाब में सिद्धू मूसेवाला की हत्या को अंजाम देने वाला शख्स क्या काम करता है, कैसे अपने काम को अंजाम देता है? ये जानकारी शायद ही किसी को होंगी लेकिन पंजाब पुलिस ने गोल्डी से जुड़े सभी दस्तावेज तैयार कर लिए है। जिसमें गोल्डी बरार के बारे में सभी जान...

जापान से ओर क्या सीख सकता है भारत

कहते है कि सीखने की कोई उर्म नहीं होती है, हमें किसी से भी, कभी भी सीख एवं प्रेरणा मिल सकती है और इस वक्त, अगर भारत चाहें तो वह जापान से काफी कुछ सीख सकता है। अमेरिका के बाद जापान, दुनिया का एकलौता ऐसा देश है, जिसने सॉफ्ट पॉवर की ताकत को सही से समझा है। वर्ष 1980 में, जापान के विदेश मंत्रालय ने एक बहुत बड़ा फैसला लिया था, जिसके तहत जापान ने, दुनिया को ये दिखाया था कि उसकी सॉफ्ट पॉवर क्या है। हालांकि वर्ष 2010 के बाद जापान की ये सॉफ्ट पॉवर, कम होने लगी थी और इसकी जगह कोरियन पॉप ने ले ली थी लेकिन इसके बाद, फिर से जापान की सरकार ने जापान को कूल जापान बनाने के लिए कई प्रयास किए, जिसके तहत उसने वर्ष 2017 में कूल जापान बोर्ड बनाया, जिसके लिए उसे ढाई हजार करोड़ रुपये का फंड दिया गया था, ताकि वह समूचे विश्व के, नक्शे पर जापान की सॉफ्ट पॉवर को एक बार फिर से स्थापित कर सके। बहरहाल, कुछ ही समय में सॉफ्ट पॉवर को कूल जापान कहा जाने लगा, जिसके तहत जे-पॉप, पोकीमॉन जैसे कार्टून कैरेक्टर्स और जापानी कॉमिक्स का परिचय जापान ने, पूरी दुनिया से कराया एवं उस दौर में पोकीमॉन को पूरी दुनिया में काफी ज्यादा...

आज़ादी के बाद, अतीत के घावों को एक बार फिर खोदा गया

 वाराणसी की निचली अदालत में पांच महिलाओं, जिनमें से एक ने अपना नाम वापस ले लिया, की पूजा करने की याचिका पर ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे कराने के आदेश पर समर्थन और विरोध, दोनों तरह की आवाज़ें सुनाई दे रहीं हैं। ये 'मस्जिद कभी मंदिर था' पर दोनों पक्ष एक दूसरे पर आक्रामक है व बहस लगातार तेज हो रहीं है। ज्ञानवापी मस्जिद पर जारी अदालती कार्रवाइयों के बीच, अदालतों में याचिकाओं की बाढ़ सी आ गई है, जहां मुस्लिम पक्ष कह रहें है कि पूजा स्थल क़ानून, के रहते ऐसे क़दम ग़ैरक़ानूनी हैं तो वहीं हिन्दू पक्ष के लोगों की अपनी अपील है। बहरहाल करीब 31 वर्ष पूर्व 1991 में, जब देश में राम मंदिर आंदोलन उफान पर था तब कांग्रेस की पीवी नरसिम्हा राव सरकार पूजा स्थल विधेयक (विशेष प्रावधान) लेकर आई थी। इस क़ानून में कहा गया था कि 15 अगस्त, 1947 के वक़्त जो भी धार्मिक स्थल जिस स्थिति में होंगे, उसके बाद से वो वैसे ही रहेगें और उसकी प्रकृति या स्वभाव में कोई भी बदलाव नहीं होगा। गौरतलब है कि, 1991 में जब देश में अयोध्या विवाद अपने चरम सीमा पर था तो नरसिम्हा राव सरकार में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्र...

मस्जिद-कभी-मंदिर-था, ये बहस कब तक?

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ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग मिलने का दावा, ताजमहल को तेजो महालय मंदिर बताना, बंद 22 कमरों को लेकर विवाद, कुतुब मीनार परिसर की कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद में पूजा अर्चना की मांग, दिल्ली जामा मस्जिद के नीचे देवी-देवताओं की मूर्ति का दावा तथा मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में याचिका पर सुनवाई। गौरतलब है कि अयोध्या में राम मंदिर बनाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अब, तीन साल बाद भारत में वापस एक बार फिर 'ये-मस्जिद-कभी-मंदिर-था' पर बहस हो रही है। अचानक अदालतों में याचिकाओं की बाढ़-सी आ गई। ऐसे वक़्त में जब यूक्रेन-रूस युद्ध से समूचे विश्व में सामरिक बदलाव हो रहे हैं, कोविड़-19 महामारी से 62 लाख लोगों की मौत के बाद भी वायरस का ख़तरा बना हुआ है एवं साल 2019 में भारत में वायु प्रदूषण से दुनिया भर में सबसे अधिक लगभग 17 लाख लोगों की मृत्यु हो गई। जब देश इन गंभीर, आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब भारत में हिंदू-मुसलमान, मंदिर-मस्जिद, 400-500-600 या हज़ार साल पहले किसने, कितने, मंदिर तोड़े, बनाए और वर्तमान में इनका क्या हो, इस पर बहस ज़ोर प...

बिहार के लिए प्रशांत किशोर का वादा... जन सुराज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन, आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के अलावा कांग्रेस के लिए काम कर चुके, पीके के नाम से मशहूर राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर अब किसी भी पार्टी के लिए चुनावी रणनीति नहीं बनाएंगे। सबसे पुरानी पार्टी के कायाकल्प के मिशन के बीच में छूटने के कारण व कांग्रेस में शामिल न होने के बाद, उन्होंने बिहार के पटना के ज्ञान भवन में प्रेस वार्ता करके "जन सुराज" के जरिए, राजनीति में अपनी नई राह की शुरुआत कर ली है। गौरतलब है कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस में शामिल होने से इनकार करने के बाद अपनी नई पार्टी बनाने का संकेत दिया है। उनका कहना है कि, लोकतंत्र में एक सार्थक भागीदार बनने और जन-समर्थक नीति को आकार देने में मदद करने की मेरी खोज का, 10 साल का सफर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा है और अब, जब मैं पन्ने पलटता हूं तो लगता है कि अब समय आ गया है कि असली मालिक के पास जाया जाएं यानी लोगों के बीच ताकि ...

अकाल का अलार्म! अनाज हो जाएगा लुप्त

 -निधि जैन मनुष्य, दिन-रात कड़ी मेहनत करता है, खून-पसीना बहाता है, ताकि उसे और उसके परिवार को दो वक्त की रोटी मिल सकें। अपने पेट की आपूर्ति के लिए, इंसान को प्रतिदिन संघर्ष करना पड़ता है। गौरतलब हैै कि हाल ही में एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि आज से ठीक 27 साल बाद समूचे विश्व में, लोगों के सामने एक ऐसा संकट खड़ा होने वाला है जिसमें लोग दो वक्त की रोटी तो छोड़िये, एक वक्त में एक रोटी के लिए भी तरस जाएगें। लाखों करोड़ों के बैंक बैलेंस, कई क्रेडिट और डेबिट कार्ड होने के बावजूद भी, रोटी तक अमीर से अमीर इंसान की पहुंच नहीं हो पाएगी। द वर्ल्ड काउंट, संस्था की रिपोर्ट ने पूरी दुनिया में अकाल की घोषणा कर दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पूरे संसार में अनाज का एक ऐसा संकट आने वाला है, जिसमें वर्ष 2050 तक अनाज नाम की चीज दुनिया से लुप्त हो जाएगी। आज से 27 साल बाद, दाल और रोटी एक दुर्लभ चीज हो जाएगी। वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी 1 हज़ार करोड़ के पार हो जाएगी, जिसके हिसाब से वर्ष 2017 के मुकाबले वर्ष 2050 में 70% अधिक खाने की आपूर्ति होगी। जबकि धरती हर साल 7500 करोड़ टन उपजाऊ मिट्टी खो रही ...

अब भी रिकार्ड हो सकती हैं कॉल

 -निधि जैन प्ले स्टोर की नीतियों में गूगल द्वारा बदलाव करने के बावजूद भी कॉल रिकॉर्डिंग की जा सकती है। हालांकि गूगल ने, यूजर्स की प्राइवेसी बनाए रखने की दलील देकर, इस पर चिंता जताई थी कि कॉल रिकॉर्डिंग से यूजर्स की प्राइवेसी खत्म होने का डर रहता है तथा इसका गलत उपयोग भी किया जा सकता है। इसलिए गूगल ने पिछले महीने, सभी थर्ड पार्टी कॉल रिकॉर्डिंग एप्स को प्ले स्टोर से बैन करने की घोषणा की थी जिसके बाद उसने ये नियम 11 मई 2022 से लागू भी कर दिया है। बहरहाल, अगर आप अपने ऐन्डरोईड़ मोबाईल फोन में कॉल रिकॉर्डिंग एप्प का प्रयोग करते हैं, तो अब आप इनका इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। नई पॉलिसी के मुताबिक, अब इन एप्स को गूगल की ऐपीआई एक्सेसिबिलिटी नहीं मिलेगी और अब ये एप्स ऐन्डरोईड़ फोन में काम नहीं करेंगे। लेकिन, गौरतलब है कि ये रोक सिर्फ थर्ड पार्टी कॉल रिकॉर्डिंग एप्स पर ही है। ये वो एप्स होते हैं, जो फोन के साथ पहले से इन्स्टॉल करके नहीं दिए जाते, जिन्हें प्ले स्टोर के जरिए डाउनलोड किया जाता है पर अगर आपके फोन में पहले से ही कोई मौजूद एवं इनबिल्ट कॉल रिकॉर्डिंग एप्प है तो आप अभी भी उसका प्रयोग...

भाजपा ने चली चाल, शिव सेना हुई असहज

 -By Nidhi Jain  वाकई क्या, जैसे 60 के दशक में कांग्रेस ने जॉर्ज के दबदबे को तोड़ने के लिए शिव सेना को बढ़ावा दिया, ठीक वैसा ही आज, शिव सेना को सत्ता में असहज करने के लिए राज ठाकरे का उपयोग कर रही है बाजपा सरकार। तीन हफ़्ते के भीतर, जिस तरह से अजान और लाउडस्पीकर को महाराष्ट्र की राजनीति में राज ठाकरे ने एक चर्चा का मुद्दा बना दिया। ये उनकी लोकप्रियता का प्रत्यक्ष उदाहरण है परन्तु इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं कि बीजेपी को पूरे राष्ट्र में एमएनएस की ज़रूरत पड़ेगी। फ़िलहाल तो, बीजेपी को महाविकास अघाड़ी गठबंधन के सामने एक वैकल्पिक नैरेटिव खड़ा करने की ज़रूरत है, जो काम बीजेपी के लिए राज ठाकरे बख़ूबी कर रहे हैं। पूर्व वर्षों में जिस तरह, बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए तीन पार्टियां एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस एक साथ आई थीं, वैसे ही आज महाविकास अघाड़ी गठबंधन को सत्ता से दूर रखने के लिए बीजेपी को भी किसी का साथ तो चाहिए ही। जो कि अब राज ठाकरे के रूप में बीजेपी को मिल रहा है तो आखिर कैसे, बीजेपी इसका राजनीतिक प्रयोग करने से चूकेगी और वैसे भी राजनीति में ये जायज़ भी है। गौरतलब ह...

दुनियाभर में, ट्विटर अब चीन की इमेज ब्रैंडिंग करेंगा?

 -By Nidhi Jain 21 मार्च 2006, करीब 16 साल पहले सैन फ्रांसिस्को में ट्विटर की स्थापना की गयी थी। जिसको अगले ही साल मार्च 2007 में 'बेस्ट स्टार्टअप' का अवार्ड भी मिल गया। प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने वाले एक साधारण से व्यक्ति, जैक डोर्सी जो रोजाना की तरह ही अपने दो दोस्तों के साथ बार में बैठ कर बातचीत कर रहें थे, तो अमुसी समय बातचीत के दौरान तीनों दोस्तों ने एक ऐसी माइक्रो ब्लॉगिंग साइट बनाने की योजना बनाई, जिसके जरिए लोग एक दूसरे के साथ जुड़ सकें और अपने विचार साझा कर सकें और कड़ी मेहनत के बाद उनकी ये योजना ट्विटर के रूप में सामने आई एवं तब से लेकर अब तक ट्विटर के एक्टिव यूजर्स की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। वर्ष 2021 में ट्विटर के एक्टिव यूजर्स की संख्या बढ़ कर लगभग 40 करोड़ हो चुकी है, जिनमें से सबसे ज्यादा, 7 करोड़ 30 लाख यूजर्स अमेरिका के हैं। इसके बाद, जापान में इसके 5 करोड़ 55 लाख यूजर्स हैं तथा भारत में ट्विटर को उपयोग करने वाले लोगों की संख्या 2 करोड़ 21 लाख है। दुनिया के विभिन्न कलाकार, नेता एवं खिलाड़ी इत्यादि, सब ट्विटर पर हैं। यहां तक की इलेक्ट्रिक कार बन...

समाज में कैसे दखल दे रहा है लाउडस्पीकर, शोर का स्वास्थ पर पड़ता है प्रतिकूल प्रभाव

 निरंतर बढ़ते प्रदूषण से मानव के साथ-साथ जीव जन्तुओं पर भी इसके दुष्प्रभाव पढ़ रहें है और तो और अनेक कारणों से वायु प्रदूषण भी लगातार बढ़ता जा रहा है। जिससे जन स्वास्थ्य के समक्ष खतरे बढ़ते जा रहे हैं। यातायात के साधनों से लेकर फैक्टरियों इत्यादि तक से निकलने वाले ध्वनि प्रदूषण को हमें इसलिए भी बर्दाश्त करना पड़ता है, क्योंकि विकास की वर्तमान परिभाषा को सार्थक करने के लिहाज से ऐसा करना काफी हद तक आवश्यक भी है। इसके अलावा, कई ऐसे अन्य कारक भी हैं जिनसे ध्वनि प्रदूषण की गंभीरता बढ़ रही है। बहरहाल, ऐसे में धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर से जुड़े विवाद के साथ विचार मंथन भी आरम्भ हो गया है कि कहीं धर्म की आड़ में लाउडस्पीकर का बढ़ता चलन, मानव के जीवन के अधिकार में खलल तो नहीं डाल रहा है एवं जिस प्रकार देश के सभी विधान समूचे लोगों पर समान रूप से लागू होते है, उसी प्रकार ध्वनि प्रदूषण संबधी विधान भी सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए। गौरतलब है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 2020 में फैसला किया था कि अजान, इस्लाम का एक अंग है, लेकिन लाउडस्पीकर लगाकर, अजान करना इस्लाम का हिस्सा नहीं है। ठीक ...

द कश्मीर फ़ाइल्स फिल्म को लेकर इतनी चर्चा क्यों?

 फ़िल्म 'द कश्मीर फ़ाइल्स' का नाम ही पूरी फ़िल्म की कहानी को बयां कर देता है। सोशल मीडिया, राजनीतिक गलियारों, फ़िल्म और मनोरंजन इंडस्ट्री और यहां तक कि हमारे-आपके घरों में भी इस फ़िल्म का नाम कई दिनों से लिया जा रहा है। कश्मीरी पंडितों के कश्मीर से पलायन पर निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की यह फ़िल्म 11 मार्च 2022 को रिलीज़ हुई है। कई थियेटरों में तो अभी तक यह फ़िल्म हाउसफ़ुल चल रही है। देश के चार राज्यों ने तो फ़िल्म को टैक्स-फ्री घोषित कर दिया है। संयोग से ये चारों राज्य (हरियाणा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात) बीजेपी शासित हैं। फ़िल्म के प्रोड्यूसर अभिषेक अग्रवाल हैं। शुरूआत से ही इस फिल्म को कई चुनौतियां का सामना करना पड़ रहा है। 'द कश्मीर फ़ाइल्स' की रिलीज़ से पहले आलिया भट्ट, संजय लीला भंसाली की फ़िल्म 'गंगूबाई काठियावाड़ी' रिलीज़ हुई थी। जो 'द कश्मीर फ़ाइल्स' के लिए चुनौती मानी जा रही थी। दूसरी चुनौती साउथ के सुपरस्टार प्रभाष की फ़िल्म राधे-श्याम थी। ये भी 'द कश्मीर फ़ाइल्स' के साथ ही रिलीज़ हुई है लेकिन बड़ी फ़िल्मों से टक्कर के बावजूद भी ...