आज़ादी के बाद, अतीत के घावों को एक बार फिर खोदा गया
वाराणसी की निचली अदालत में पांच महिलाओं, जिनमें से एक ने अपना नाम वापस ले लिया, की पूजा करने की याचिका पर ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे कराने के आदेश पर समर्थन और विरोध, दोनों तरह की आवाज़ें सुनाई दे रहीं हैं। ये 'मस्जिद कभी मंदिर था' पर दोनों पक्ष एक दूसरे पर आक्रामक है व बहस लगातार तेज हो रहीं है। ज्ञानवापी मस्जिद पर जारी अदालती कार्रवाइयों के बीच, अदालतों में याचिकाओं की बाढ़ सी आ गई है, जहां मुस्लिम पक्ष कह रहें है कि पूजा स्थल क़ानून, के रहते ऐसे क़दम ग़ैरक़ानूनी हैं तो वहीं हिन्दू पक्ष के लोगों की अपनी अपील है।
बहरहाल करीब 31 वर्ष पूर्व 1991 में, जब देश में राम मंदिर आंदोलन उफान पर था तब कांग्रेस की पीवी नरसिम्हा राव सरकार पूजा स्थल विधेयक (विशेष प्रावधान) लेकर आई थी। इस क़ानून में कहा गया था कि 15 अगस्त, 1947 के वक़्त जो भी धार्मिक स्थल जिस स्थिति में होंगे, उसके बाद से वो वैसे ही रहेगें और उसकी प्रकृति या स्वभाव में कोई भी बदलाव नहीं होगा।गौरतलब है कि, 1991 में जब देश में अयोध्या विवाद अपने चरम सीमा पर था तो नरसिम्हा राव सरकार में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री रहे पी चिदंबरम को लगा कि हम अयोध्या के बारे में कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि ये पुरानी लड़ाई है और जब, अब तक सालों से ये मुकदमा जारी हैं तो आगे भी ऐसे ही रहें तो ही ठीक है लेकिन इस मामले को अभी दबाना जरूरी है क्योंकि अगर इस मसले को अभी नहीं दबाया गया तो यकीनन ही देश में कुछ समय में दंगों का माहौल बन जाएगा। इसलिए उस वक्त उन्होंने, सभी झगड़ों को एक बार में, ख़त्म करने के लिए प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) क़ानून बनाया और उसे तत्काल लागू कर दिया।
हालांकि बीजेपी ने इस क़ानून का विरोध किया। संसद में खजुराहो से भाजपा सांसद रहीं उमा भारती, जो कि उस समय, इस क़ानून के ख़िलाफ़ पार्टी की ओर से प्रमुख वक्ता थीं, उन्होंने लगातार इस कानून का विरोध किया लेकिन कांग्रेस की ओर से लगातार दलीलें दी जा रहीं थी और अपने फैसले को सही ठहराने के लिए हर मुमकिन प्रयास किया जा रहा था पर अब 31 साल बाद ये क़ानून फिर बहस के केंद्र में है।
हालांकि राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर, अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 1991 में संसद का बनाया पूजा स्थल क़ानून, 1991 संविधान के प्रमुख मूल्यों को संरक्षित और सुरक्षित करता है एवं इस क़ानून की धारा 5 में ये भी लिखा है कि ये क़ानून राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले पर लागू नहीं होगा।
इसके अलावा क़ानून में तीन और स्थितियों के अंतर्गत छूट है। क़ानून के तहत, अगर किसी धार्मिक जगह का कैरेक्टर या स्वभाव 15 अगस्त, 1947 के बाद बदला हो, तो ऐसा हो सकता है कि आप इस क़ानून के होने के बावजूद मुक़दमा दायर कर सकते हैं और ये फैसला, अदालत करेगी कि क्या उस धार्मिक जगह का कैरेक्टर या स्वभाव 15 अगस्त, 1947 के बाद बदला है या नहीं। दूसरी स्थिति तब पैदा हो सकती है अगर यह दावा किया जाए कि कोई धार्मिक जगह 100 साल से ज़्यादा पुरानी है, वो ऐतिहासिक महत्व का स्मारक है, पुरातत्व संबंधी जगह है, या फिर वो प्राचीन स्मारक और पुरातत्वीय स्थल है और अवशेष क़ानून, 1958 के तहत आता है तो ऐसे दावों की पुष्टि के लिए अदालत उस जगह का सर्वे करवा सकती है। तीसरी स्थिति तब पैदा होती है, जब क़ानून के लागू होने की शुरुआत से पहले सभी पक्षों में झगड़े पर समझौता हो गया हो।
गौरतलब है कि, 'मस्जिद-कभी-मंदिर-था' ये बहस बार-बार विभिन्न मुद्दों पर उठती रहती है, जिसके कारण कई संप्रदायों में आपसी मत-भेद बढ़ जाता है और दंगों की स्थिति पैदा हो जाती है, जो किसी भी प्रशन या समस्या का सवाल या हल नहीं है।
आज़ादी के बाद, अतीत के घावों को एक बार फिर इस विवाद ने खड़ा कर दिया है लेकिन सांप्रदायिक मेलजोल और मित्रभाव की परंपरा को हमें समय रहते दोबारा स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए वरना आने वाले समय में जब देश पहलें से ही कई परेशानियों से जूझ रहा है ऐसे में ये विवाद, संकट की स्थिति अवश्य पैदा कर सकता है।
-निधि जैन