भाजपा ने चली चाल, शिव सेना हुई असहज
-By Nidhi Jain
वाकई क्या, जैसे 60 के दशक में कांग्रेस ने जॉर्ज के दबदबे को तोड़ने के लिए शिव सेना को बढ़ावा दिया, ठीक वैसा ही आज, शिव सेना को सत्ता में असहज करने के लिए राज ठाकरे का उपयोग कर रही है बाजपा सरकार।
तीन हफ़्ते के भीतर, जिस तरह से अजान और लाउडस्पीकर को महाराष्ट्र की राजनीति में राज ठाकरे ने एक चर्चा का मुद्दा बना दिया। ये उनकी लोकप्रियता का प्रत्यक्ष उदाहरण है परन्तु इसका मतलब ये बिल्कुल भी नहीं कि बीजेपी को पूरे राष्ट्र में एमएनएस की ज़रूरत पड़ेगी। फ़िलहाल तो, बीजेपी को महाविकास अघाड़ी गठबंधन के सामने एक वैकल्पिक नैरेटिव खड़ा करने की ज़रूरत है, जो काम बीजेपी के लिए राज ठाकरे बख़ूबी कर रहे हैं।पूर्व वर्षों में जिस तरह, बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए तीन पार्टियां एनसीपी, शिवसेना और कांग्रेस एक साथ आई थीं, वैसे ही आज महाविकास अघाड़ी गठबंधन को सत्ता से दूर रखने के लिए बीजेपी को भी किसी का साथ तो चाहिए ही। जो कि अब राज ठाकरे के रूप में बीजेपी को मिल रहा है तो आखिर कैसे, बीजेपी इसका राजनीतिक प्रयोग करने से चूकेगी और वैसे भी राजनीति में ये जायज़ भी है।
गौरतलब है कि बीजेपी का राज ठाकरे के साथ जाना व्यावहारिक नहीं लग रहा है। ये दोनों साथ-साथ कुछ दूर ज़रूर चल सकते हैं ताकि शिवसेना को थोड़ा असहज किया जा सके और शायद इसलिए बीजेपी चालाकी से केवल उनको बढ़ावा देने वाली बातें कर रही है, खुल कर उनके समर्थन में नहीं उतर रही है।
पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता देवेन्द्र फडणवीस एवं भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता भले ही सीधे तौर पर राज ठाकरे पर कुछ ना कह रहे हों, लेकिन लाउड स्पीकर और हनुमान चालीसा पर उनके समर्थन में दिखते है तथा इन्हीं बयानों के कारण, बीजेपी पर आरोप लग रहे हैं कि वो राज ठाकरे का इस्तेमाल तो नहीं कर रहें?
बहरहाल, भारत की राजनीति में ये महारत केवल बीजेपी को ही हासिल है कि वो जब चाहे, जिस राज्य में चाहे, किसी क्षेत्रीय पार्टियों का प्रयोग अपने हित के लिए कर सकती है। जैसे बिहार में उन्होंने चिराग पासवान का इस्तेमाल किया और नीतीश कुमार को तीसरे नम्बर पर ले आए। तेलंगाना के नगर निगम चुनाव में ओवैसी का इस्तेमाल करके अपना प्रदर्शन बेहतर किया। 2022 के चुनावों में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ को सरकार में लाने के लिए एवं बीजेपी की जीत दिलाने में, मायावती का बड़ा हाथ है, जो कि राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं। हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि बाजपा ऐसा पंजाब में नहीं कर पाई। कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी के साथ इस बार उन्होंने गठबंधन किया लेकिन इसका बहुत लाभ उन्हें हालही में हुए पंजाब के विधानसभा चुनाव में नहीं मिला।
गत दिनों में हुई, राज ठाकरे की रैली में जिस संख्या में उनके समर्थन पहुंचे थे। वो उनकी बढ़ती वी लोकप्रियता को बखूबी दर्शाता है और ये कहना गलत नहीं होगा कि राज ठाकरे की पार्टी का अकेले में भी वजूद है। एक दौर में एमएनएस के 11 विधायक चुन कर विधानसभा पहुँचे थे परन्तु आज, उनका केवल एक विधायक है। एक दौर वो भी था जब मुंबई से शिव सेना या बीजेपी का एक भी प्रतिनिधि संसद नहीं पहुँचा था, तब मुंबई मराठियों की है वाला कैंपेन एमएनएस ने चलाया था। उस दौर में बीजेपी और शिव सेना को एमएनएस ने बहुत नुक़सान पहुँचाया था और अब, भारतीय जनता पार्टी तथा एमएनएस का एक दूसरे को समर्थन करना, किसी नई राजनीतिक योजना का इशारा करता हैं एवं अचानक से महाराष्ट्र राज्य की राजनीति में राज ठाकरे का दोबारा से सक्रिय होना कई सवालों को जन्म देता है।