मनुष्यों के लिए खतरा है 5जी.?

-निधि जैन

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को दिल्ली के प्रगति मैदान से 5जी सेवा और मोबाइल कांग्रेस 2022 के छठे संस्करण की शुरुआत की है। जिसके बाद देश के आठ शहरों में 5जी सेवा उपलब्ध हो चुकी है। जिनमें दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु और वाराणसी आदि शहरों का नाम शामिल है। बता दें कि इस मौके पर जियो, एयरटेल और वोडाफ़ोन-आइडिया, तीनों कंपनियों के मालिक भी मौजूद थे लेकिन बडा सवाल ये है कि क्या 5जी मनुष्य के लिए खतरा हैं.?

90 के दशक से ही इस तकनीक का विरोध क्यों

आधुनिकीकरण के दौर में मोबाइल फोन के बिना इंसान शायद ही अपना जीवन व्यतीत कर सकता है, क्योंकि हम लगभग हर चीज के लिए इस पर निर्भर हो चुके है। लेकिन इसी के साथ कई लोगों का ये भी मानना है कि मोबाइल फ़ोन के उपयोग से इंसान के स्वास्थ पर प्रतिकूल असर पड़ता है। 90 के दशक में भी कुछ लोगों का मानना था कि कान पर फ़ोन लगा कर रखने से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। जिसका खुलासा करने के लिए उन लोगों ने मोबाइल फ़ोन कंपनियों के खिलाफ कोर्ट में जाना उचित समझा था लेकिन उस वक्त कोर्ट ने इस तरह के मामलों को खारिज कर दिया था।

लोगों के मन में क्यों है संदेह

इतिहास भी इस बात का गवाह है कि नए आविष्कारों को लेकर हमेशा से ही लोगों के मन में डर रहा है। जब पहले रेल चलनी शुरू हुई तो लोगों का कहना था कि रेल की गती से बीमारियां होती है व यात्रा के दौरान लगातार झटके लगने और हिलते रहने से रीढ़ की हड्डी पर भी असर होता है। और जब मोबाइल फ़ोन आया था तो तब भी इस पर लोगों को संदेह था। कुछ समूह के लोगों का दावा था कि मोबाइल फ़ोन के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन के साइइफेक्ट होते हैं। बता दें कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम पर माइक्रोवेव फ्रीक्वेंसी और मोबाइल तकनीक में इस्तेमाल होने वाली फ्रीक्वेन्सी आसपास होती हैं।
माइक्रोवेव में कम फ्रीक्वेंसी रेडिएशन का इस्तेमाल हाई पावर पर होता है जिससे खाना गर्म होता है लेकिन मोबाइल फ़ोन तकनीक में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि रेडिएशन से गर्मी न पैदा हो और अगर ये शरीर के टिशू को गर्म नहीं करता है तो इससे कोई खतरा नहीं है। गौरतलब है कि मोबाइल फ़ोन और माइक्रेवेव रेडिएशन नॉन-आयोनाइज़िंग रेडिएशन की श्रेणी में आते हैं, जिनसे किसी भी तरह के खतरे की पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। जिससे ये स्पष्ट होता है कि न तो मोबाइल फोन और न ही 5जी तकनीक से इंसानों को खतरा है।
बहरहाल 4जी के मुक़ाबले 5जी की फ्रीक्वेंसी अधिक ज़रूर है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि ये मनुष्य के शरीर के टिशू को नुक़सान पहुंचाए।

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