जानिए कब और कैसे शुरू हुआ ज्ञानवापी मामला, कब होगी अगली सुनवाई
-निधि जैन
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का मामला लंबे समय से कोर्ट में चल रहा है। जिसमें कल यानी 12 सितंबर को अहम सुनवाई हुई। कोर्ट ने अपने फैसले में माना है कि इस फैसले में साल 1991 का प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता है। बता दें कि जिला कोर्ट के जज अजय कृष्णा विश्वेश ने ये फैसला दिया है। उन्होंने श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजन-दर्शन की अनुमति की मांग वाली याचिका को सुनवाई के लायक माना है और मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया है। जिसके बाद अब इस मामले में अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।
इस मामले में नहीं लागू होगा वर्शिप एक्ट
हिंदू पक्ष के वकील हरिशंकर जैन ने बताया कि कोर्ट ने अपने फैसले में माना है कि इस फैसले में साल 1991 का प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता है।
गौरतलब है कि मुस्लिम पक्ष की दलील थी कि 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के तहत कोई फैसला लेने की मनाही है। वर्ष 1991 का ये कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, वो उसी रूप में रहेगा। हालांकि, अयोध्या के मामले को इससे अलग रखा गया था।
बहरहाल वकील हरिशंकर जैन ने बताया कि अब अगली सुनवाई में दोनों पक्ष कोर्ट में अपनी दलीलें और सबूत रखेंगे।
क्या है पूरा मामला
बता दें कि यह पूरा मामला तब सुर्खियों में आया जब वाराणसी की एक अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सर्वे करने का निर्देश दिये। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट और वाराणसी की अदालतों में कई याचिकाएं दाखिल की गई, जिनमें दावा किया गया कि 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर यहां ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण करवाया था।
बहरहाल इसके बाद साल 2019 में एक स्थानीय वकील विजय शंकर रस्तोगी ने निचली अदालत में याचिका दाखिल की, जिसमें उन्होंने दावा किया कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण अवैध तरीके से हुआ था, उन्होंने मस्जिद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जरिए सर्वे कराने की भी मांग की। ये याचिका, रामजन्मभूमि के पक्ष में फैसला आने के बाद दाखिल की गई थी।
अदालत के फैसले का किया विरोध
अप्रैल 2021 में वाराणसी की स्थानीय अदालत ने ऐएसआई को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में सर्वे करने और उसकी रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया। जिसके विरोध में ज्ञानवापी मस्जिद का संचालन करने वाली अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में दलीलें दी और उन्होंने मस्जिद में किसी तरह के सर्वे कराए जाने के अदालत के फैसले का भी विरोध किया। जिसके बाद मामला वाराणसी की स्थानीय अदालत से निकलकर इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया। अदालत ने इस मामले में सुनवाई की और ऐएसआई द्वारा सर्वे किए जाने पर अंतरिम रोक लगा दी।
जिसके बाद वर्ष 2022 में पांच महिलाओं ने ज्ञानवापी मस्जिद की बाहरी दीवारों पर मौजूद हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों की नियमित तौर पर पूजा-अर्चना करने के लिए इजाजत मांगते हुए याचिका दायर की। जिसके बाद अदालत ने एक कमेटी का निर्माण किया और ज्ञानवापी-गौरी श्रृंगार कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट की वीडियोग्राफी करके इसकी रिपोर्ट 10 मई तक दाखिल करने को कहा।
सुरक्षा व्यवस्था के बीच पूरा हुआ सर्वे
हालांकि अदालत ने 12 मई को सुनवाई के दौरान कमेटी से सर्वेक्षण जारी रखने को कहा और 17 मई तक रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया। जिसके बाद अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी ने काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में सर्वेक्षण पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन इसके बीच सर्वेक्षण कमेटी ने ज्ञानवापी-गौरी श्रृंगार कॉम्प्लेक्स के दो बेसमेंट में सर्वे और वीडियोग्राफी का कार्य 14 अप्रैल को भारी सुरक्ष व्यवस्था के बीच पूरा करवाया। जिसके बाद अब फैसला यहां तक पहुंचा है कि कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की अपील खारिज कर दी है। जिस पर अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी के अधिवक्ता मेराजुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि वह अब इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट जाएंगे। वहीं अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी के लोगों ने कोर्ट के इस फैसले पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।
हिंदू समाज में उठी खुशी की लहर
अदालत का फैसला आते ही हिंदू समाज में खुशी की लहर उठी है। हिंदू पक्ष का कहना है कि यह हिंदू समाज की जीत है। बहरहाल ज्ञानवापी परिसर में मंदिर के अनेक साक्ष्य और प्रमाण हिन्दू पक्ष के धिवक्ताओं ने पेश किये, हालंकि आगामी फैसला आना अभी बाकी है। हिंदू पक्ष के अधिवक्ता सुभाष नंदन चतुर्वेदी ने कहा कि कमिशन रिपोर्ट पर अगली सुनवाई होगी, जिसमे हम कोर्ट से मांग करेंगे कि दीवार तोड़कर सर्वे का काम कराया जाए। इसके अलावा उन्होंने कहा कि औरंगजेब ने भगवान आदि विश्वेश्वर की मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई थी, जिसका अधिकार हिंदुओं को मिलना चाहिए।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का मामला लंबे समय से कोर्ट में चल रहा है। जिसमें कल यानी 12 सितंबर को अहम सुनवाई हुई। कोर्ट ने अपने फैसले में माना है कि इस फैसले में साल 1991 का प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता है। बता दें कि जिला कोर्ट के जज अजय कृष्णा विश्वेश ने ये फैसला दिया है। उन्होंने श्रृंगार गौरी मंदिर में पूजन-दर्शन की अनुमति की मांग वाली याचिका को सुनवाई के लायक माना है और मुस्लिम पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया है। जिसके बाद अब इस मामले में अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।
इस मामले में नहीं लागू होगा वर्शिप एक्ट
हिंदू पक्ष के वकील हरिशंकर जैन ने बताया कि कोर्ट ने अपने फैसले में माना है कि इस फैसले में साल 1991 का प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता है।
गौरतलब है कि मुस्लिम पक्ष की दलील थी कि 1991 के प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के तहत कोई फैसला लेने की मनाही है। वर्ष 1991 का ये कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, वो उसी रूप में रहेगा। हालांकि, अयोध्या के मामले को इससे अलग रखा गया था।
बहरहाल वकील हरिशंकर जैन ने बताया कि अब अगली सुनवाई में दोनों पक्ष कोर्ट में अपनी दलीलें और सबूत रखेंगे।
क्या है पूरा मामला
बता दें कि यह पूरा मामला तब सुर्खियों में आया जब वाराणसी की एक अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद का भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सर्वे करने का निर्देश दिये। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट और वाराणसी की अदालतों में कई याचिकाएं दाखिल की गई, जिनमें दावा किया गया कि 16वीं शताब्दी में मुगल बादशाह औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर यहां ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण करवाया था।
बहरहाल इसके बाद साल 2019 में एक स्थानीय वकील विजय शंकर रस्तोगी ने निचली अदालत में याचिका दाखिल की, जिसमें उन्होंने दावा किया कि ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण अवैध तरीके से हुआ था, उन्होंने मस्जिद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जरिए सर्वे कराने की भी मांग की। ये याचिका, रामजन्मभूमि के पक्ष में फैसला आने के बाद दाखिल की गई थी।
अदालत के फैसले का किया विरोध
अप्रैल 2021 में वाराणसी की स्थानीय अदालत ने ऐएसआई को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में सर्वे करने और उसकी रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया। जिसके विरोध में ज्ञानवापी मस्जिद का संचालन करने वाली अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में दलीलें दी और उन्होंने मस्जिद में किसी तरह के सर्वे कराए जाने के अदालत के फैसले का भी विरोध किया। जिसके बाद मामला वाराणसी की स्थानीय अदालत से निकलकर इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया। अदालत ने इस मामले में सुनवाई की और ऐएसआई द्वारा सर्वे किए जाने पर अंतरिम रोक लगा दी।
जिसके बाद वर्ष 2022 में पांच महिलाओं ने ज्ञानवापी मस्जिद की बाहरी दीवारों पर मौजूद हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों की नियमित तौर पर पूजा-अर्चना करने के लिए इजाजत मांगते हुए याचिका दायर की। जिसके बाद अदालत ने एक कमेटी का निर्माण किया और ज्ञानवापी-गौरी श्रृंगार कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट की वीडियोग्राफी करके इसकी रिपोर्ट 10 मई तक दाखिल करने को कहा।
सुरक्षा व्यवस्था के बीच पूरा हुआ सर्वे
हालांकि अदालत ने 12 मई को सुनवाई के दौरान कमेटी से सर्वेक्षण जारी रखने को कहा और 17 मई तक रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया। जिसके बाद अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी ने काशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में सर्वेक्षण पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन इसके बीच सर्वेक्षण कमेटी ने ज्ञानवापी-गौरी श्रृंगार कॉम्प्लेक्स के दो बेसमेंट में सर्वे और वीडियोग्राफी का कार्य 14 अप्रैल को भारी सुरक्ष व्यवस्था के बीच पूरा करवाया। जिसके बाद अब फैसला यहां तक पहुंचा है कि कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष की अपील खारिज कर दी है। जिस पर अंजुमन इंतेजामिया मस्जिद कमेटी के अधिवक्ता मेराजुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि वह अब इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट जाएंगे। वहीं अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी के लोगों ने कोर्ट के इस फैसले पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया।
हिंदू समाज में उठी खुशी की लहर
अदालत का फैसला आते ही हिंदू समाज में खुशी की लहर उठी है। हिंदू पक्ष का कहना है कि यह हिंदू समाज की जीत है। बहरहाल ज्ञानवापी परिसर में मंदिर के अनेक साक्ष्य और प्रमाण हिन्दू पक्ष के धिवक्ताओं ने पेश किये, हालंकि आगामी फैसला आना अभी बाकी है। हिंदू पक्ष के अधिवक्ता सुभाष नंदन चतुर्वेदी ने कहा कि कमिशन रिपोर्ट पर अगली सुनवाई होगी, जिसमे हम कोर्ट से मांग करेंगे कि दीवार तोड़कर सर्वे का काम कराया जाए। इसके अलावा उन्होंने कहा कि औरंगजेब ने भगवान आदि विश्वेश्वर की मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाई थी, जिसका अधिकार हिंदुओं को मिलना चाहिए।