गुस्ताखी चीन की, सज़ा पूरी दुनिया भर रही
चीन से जन्मा कोरोना वायरस समूचे विश्व के लिए अभिशाप बनकर आया है इस पर तो कोई शंका नहीं हैं, लेकिन सवाल तो यह है कि क्या इस वायरस से ठीक हो चुके मरीज पहले की ही तरह यानी कोविड़-19 काल से
पहले की तरह अपनी जिंदगी जी पाएगें, क्या वायरस संक्रमित मरीज पहले की तरह ही स्वस्थ हो पाएंगे?
क्योंकि एक रिसर्च के मुताबिक यह पता चला है कि कोरोना संक्रमण से ठीक हुए मरीजों को अब सांस लेने में तकलीफ, थकान, चिंता और डिप्रेशन जैसे लक्षण परेशान कर रहे हैं जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि स्वस्थ होने के बाद भी इन मरीजों का जीवन दोबारा कभी सामान्य नहीं हो पाएगा। ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा की गई रिसर्च के अनुसार कोविड-19 के संक्रमण से ठीक होने के बाद भी हर दस में से छह मरीजों को सांस लेने में तकलीफ की दिक्कत हो ही रही हैं। जांच में पता चला कि वायरस से पीड़ित लोगों को ठीक होने के बाद 60 प्रतिशत मरीजों के फेफड़े, 29 प्रतिशत मरीजों की किडनी, 26 प्रतिशत के हार्ट और दस प्रतिशत मरीजों के लिवर ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। जो अवश्य ही भयावह है।
कुछ मरीजों के तो एक से अधिक ऑर्गन्स में परेशानी हुईं व स्वस्थ होने के कई महीनों बाद भी मरीजों के ऑर्गन्स में सूजन और जलन जैसी दिक्कतें हो रही हैं। हर दस में से पांच मरीज ऐसे भी है जिन्हें थकान की समस्या हो रही है एंव कई मरीजों में चिंता और डिप्रेशन के लक्षण भी नजर आ रहें हैं।ब्रिटेन के मरीजों में तो यह लक्षण कोरोना से संक्रमित होने के दो से तीन महीने बाद से ही दिखाई दे रहे थे।जिसके बाद ब्रिटेन के विशेषज्ञों ने तो इसे लंबे वक्त तक चलने वाले कोरोना वायरस के इन लक्षणों का नाम लॉन्ग कोविड़ नाम भी घोषित कर दिया। यह स्टडी ब्रिटेन में 50 मरीजों पर की गई है, जो भारत के उन 67 लाख लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जो जानलेवा कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं। बहरहाल डॉक्टरों के अनुसार, वायरस का संक्रमण ठीक होने में 14 दिनों का समय लगता है व इंफेक्शन ठीक होने के बाद भी यह हो सकता है कि पीड़ित को अस्पताल से छुट्टी मिल जाए परन्तु कोरोना के कुछ लक्षण स्वस्थ होने के बाद भी मरीजों के शरीर में मौजूद रह सकते हैं तथा कोविड़-19 का संक्रमण सिर्फ शरीर को ही नहीं, बल्कि लोगों के परिवार को आर्थिक रूप से भी तोड़ सकता है क्योंकि एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि देश के लगभग बीस करोड़ परिवार कोरोना वायरस के महंगे इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं जिसका मतलब तो साफ है कि बिना किसी सेना या बिना किसी सामान की घुसपैठ के चीन ने इस बार भारत के बीस करोड़ परिवारों पर बड़ा संकट गिरा दिया हैं और एक सर्वे के मुताबिक भी पता चला है कि दिल्ली के 80 प्रतिशत परिवार हर महीने 25 हजार रुपये से कम ही खर्च करते हैं एंव हर महीने इतना कम खर्च करने के मामले में दिल्ली पूरे देश में नंबर वन है यानी अगर दिल्ली के किसी परिवार में पांच व्यक्ति हैं तो हर एक व्यक्ति पर औसत खर्च सिर्फ पांच हजार रुपये ही है।
हालांकि परिवार में अगर किसी एक व्यक्ति को भी कोविड़-19 का इंफेक्शन हो जाता है तो सिर्फ उस अकेले के इलाज के खर्च से ही यकीनन वह परिवार टूट सकता है व दिल्ली में कोरोना वायरस के इलाज के खर्च की लिमिट तो तय है जिसके अनुसार दिल्ली के अस्पतालों में एक मरीज के लिए दस दिनों तक आईसीयू का खर्च एक लाख 50 हजार रुपये तक है और अगर आईसीयू के साथ वेंटिलेटर का भी दस दिनों तक उपयोग किया जाए तो यही खर्च अधिकतम एक लाख अस्सी हजार रुपये तक हो जाएंगा यानी कोरोना संक्रमण के दस दिनों के इलाज का औसत खर्च डेढ़ लाख से लेकर एक लाख अस्सी हजार रुपये तक है एंव इलाज का यह बिल दिल्ली के अस्सी प्रतिशत परिवारों के महीनेभर के खर्च के मुकाबले तो आमदनी पांच गुना से लेकर सात गुना तक अधिक है। उससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात तो यह है कि यह बिल तो तब आएगा जब प्राइवेट अस्पताल सरकार के तय रेट के हिसाब से ही बिल वसूल रहे होंगें यानी दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में कोरोना के इलाज में आईसीयू में दस दिन बिताने पड़ जाएं तो यहीं बिल सात लाख से दस लाख रुपए से कम नहीं आएगा। जो मध्यमवर्गीय परिवार व रोज का कमाने खाने वाले लोग तो कभी उठा ही नहीं पाएगें। जिससे यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि अगर दिल्ली के परिवारों के लिए यह खर्च इतना ज्यादा है तो देश के बाकी राज्यों का क्या हाल होगा। भारत में रहने वाले वो लोग जो इतना पैसा तो खर्च ही नहीं कर सकते वह इतना धन कहा से लाएंगे तो ऐसे में उनके पास दो ही विकल्प बचते हैं कि या तो वह अपना इलाज कराएं व वह इस इलाज के लिए लोन लें परन्तु समस्या तो यह है कि इलाज जितना लंबा चलता है उसका खर्च भी उतना ही बढ़ता जाता है।
जो शायद ही वह लोग उठा सकें और यह कहना तो बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि कोरोना वायरस ने लोगों को आर्थिक, शारीरिक और मानसिक तौर पर बीमार कर दिया हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च भले ही ब्रिटेन में हुई हो, परन्तु इसके प्रमाण ब्रिटेन तक ही सीमित नहीं हैं क्योंकि भारत के मरीजों में भी ऐसे ही लक्षण दिखाई दे रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि चीन से शुरू हुए इस वायरस के कारण दुनिया को लगभग 58 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है जो सिर्फ एक अनुमान है क्योंकि असली नुकसान तो इससे कहीं ज्यादा ही होगा जो कि 110 लाख करोड़ रुपये तक भी जा सकता हैं। पिछली तिमाही यानी जुलाई, अगस्त और सितंबर के महीने में चीन की जीडीपी की रफ्तार 4.9 प्रतिशत रही है, व इस वक्त चीन ही संसार का एकमात्र बड़ा देश है जिसकी अर्थव्यस्था घटने के बदले बढ़ रही है एंव इस वर्ष तो एशिया में चीन की ग्रोथ तो सबसे ज्यादा रही हैं मतलब पूर्ण विश्व को कोरोना महामारी में फंसाकर चीन अपनी रफ्तार बढ़ा रहा है। कोरोना संक्रमण की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 24 प्रतिशत सिकुड़ गई है वहीं अमेरिका को भी करीब 117 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है और यह आंकड़े तो पहले लगाए गए अनुमान से कहीं अधिक हैं यानी गुस्ताखी चीन ने की है परन्तु चालान पूरी दुनिया भर रही हैं।
-निधि जैन