पत्रकारिता के नाम पर टीआरपी की दुकान

हकीकत में क्या भारत के लोग भी फरमाइशी खबरों का ही चित्रहार टीवी पर देखना चाहते हैं ? क्या भारत के लोग अब न्यूज़ चैनलों पर न्यूज़ की बजाय नौटंकी देखकर अपना मनोरंजन करना चाहते हैं ? क्योंकि कुछ न्यूज़ चैनलों पर इस समय तो यहीं ही दिखाया जा रहा है। जिस पर पूरे देश में बहस हो रही है।
अब सुशांत सिंह राजपूत केस और हाथरस हत्याकांड दो ऐसी बड़ी खबरें हैं जिनमें टीआरपी के नाम पर सत्य में फेक न्यूज की मिलावट होने लगी है, पत्रकारिता के नाम पर आम लोगों का मनोरंजन करने की होड़ मच गई व न्याय और सत्य इस फरमाइशी रंगमंच के पर्दे के पीछे चले गए एवं देश के लोग चुपचाप यह होते हुए देखते रहे हैं।
बहरहाल कहते हैं ना कलम यानी पत्रकारिता की ताकत, तलवार की ताकत से भी कई गुना ज्यादा होती है लेकिन आज के दौर की समस्या तो यही है कि कलम से सत्य लिखने वालों की संख्या बहुत ही कम हो चुकी है, जबकि हाथ में माइक और कैमरा लेकर न्यूज़ की नाट्यशाला में करतब दिखाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है तो ऐसे में जब खबरों का अस्तित्व सिर्फ टीआरपी और फेक न्यूज के इर्द गिर्द ही सिमटकर रह जाता है तो अवश्य ही लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगती है। जो वास्तविक में हो भी रहीं है। भारत का लोकतंत्र जिन चार स्तंभों पर टिका है उनकी नींव भी लगातार हिल रही है। वह चार स्तंभ हैं, विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका और पत्रकारिता। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी पत्रकारिता में तो अब फेक न्यूज़ की मिलावट पूर्ण रूप से हो ही चुकी है और इसकी नींव भी बहुत कमजोर स्थिति में हैं। यानी कुल मिलाकर भारत का लोकतंत्र इस समय सिर्फ एक स्तंभ पर ही टिका है जिसे हम न्यायपालिका कहते हैं लेकिन यहां भी झटके लगने की शुरुआत हो चुकी है और इसकी स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। हालांकि सबसे ज्यादा संकट पत्रकारिता के स्तंभ के कमजोर होने से खड़ा हुआ है क्योंकि बाकी के तीन स्तंभों पर नजर रखने की जिम्मेदारी पत्रकारिता की ही होती है और अगर यह स्तंभ ही टूट जाएगा तो बाकी की तीनों व्यवस्थाओं के निरंकुश होने का खतरा बहुत बढ़ जाएगा।
तथा सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में पटना में जो एफआईआर दर्ज हुई हैं। उसमें कहीं भी हत्या का जिक्र नहीं है, यहां तक कि खुद सुशांत का परिवार भी हत्या की बात नहीं कह रहा है। फिर भी मीडिया का एक हिस्सा हर कीमत पर इसे हत्या साबित करना चाहता है, जबकि अभी तक इस मामले की जांच आत्महत्या की तरफ ही इशारा कर रही है। दूसरी तरफ हाथरस की बेटी के मामले में किसी भी मेडिकल रिपोर्ट में रेप की पुष्टि नहीं हुई लेकिन यहां भी मीडिया का एक हिस्सा इसे किसी भी कीमत पर गैंगरेप साबित करना चाहता है। हालांकि इस मामले में जब लड़की ने बयान बदला तो पुलिस ने भी एफआईआर में रेप की धारा को जोड़ दिया था लेकिन अभी तक की जांच से रेप की बात साबित हो ही नहीं पाई है। गौरतलब है कि तथ्यों को तिलांजलि देकर, झूठ का यह कारोबार सिर्फ टीआरपी के लिए हो रहा है। समस्या तो यह हो गई है कि अगर किसी मामले पर कोई कुछ बोलता है तो मीडिया उसे उसी के खिलाफ उपयोग करने लगता है और अगर कोई कुछ नहीं बोलता तो उसकी खामोशी को भी उसी के खिलाफ उपयोग किया जाता है। इस देश में पहले लोग खाने पीने की चीजों में ही मिलावट की शिकायत करते थे लेकिन अब लोगों की रगों में भी असत्य का वायरस पहुंचाया जा रहा है और कोई भी इस मिलावट की शिकायत नहीं कर रहा हैं। मीडिया में यह बदलाव देश के भविष्य के लिए खतरनाक है।
हाथरस की तरह ही सुशांत सिंह राजपूत मामले की सच्चाई भी कुछ और ही निकल कर आ रही है। सुशांत सिंह राजपूत की मौत के कारणों की जांच के लिए एम्स के डॉक्टरों का एक मेडिकल बोर्ड बनाया गया था। जिसके बाद कुछ चैनलों पर खबर चल रही थी कि सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या की है। कुछ चैनल कह रहे हैं कि सुशांत की हत्या हुई है। जिस पर एम्स के मेडिकल बोर्ड ने सफाई दी है। मेडिकल बोर्ड का कहना है कि हमने अपनी जांच सीबीआई को सौंप दी है एंव सीबीआई ने भी एक बयान जारी करके कहा है कि वो इस मामले की अभी हर एंगल से जांच कर रही है।
उल्लेखनीय है कि एम्स और सीबीआई को आज इस मामले में इसलिए सफाई देनी पड़ी क्योंकि चैनलों की टीआरपी की लड़ाई में यह दोनों संस्थाएं अब फंस चुकी हैं। अधिकारी अब इतना डर गए हैं कि अगर वो अनौपचारिक तौर पर किसी पत्रकार से कोई बात करते भी हैं तो उनकी बातों को भी बिना उनकी इजाजत के रिकॉर्ड कर लिया जाता है और अगर यह लोग चुप रहते हैं तो इन पर मिलीभगत के आरोप लगा दिए जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि एम्स की रिपोर्ट में क्या कहा गया है इसकी औपचारिक जानकारी अभी तक तो मीडिया में जारी नहीं की गई है परन्तु यह सारी लड़ाई आधे अधूरे बयानों और सूत्रों के दम पर लड़ी जा रही है और कोई भी सत्य के बाहर आने का इंतजार करने के लिए तैयार है ही नहीं।
प्रशन तो यह हैं कि मीडिया की इस विश्वसनीयता पर यह संकट आया ही क्यों? मीडिया खबर के नाम पर नौटंकी दिखा ही क्यों रहीं है और यह नौटंकी मनोरंजन में कैसे बदल गई। भारत में इस समय 400 न्यूज़ चैनल हैं व इसलिए हर सच के सैकड़ों संस्करण सामने आ रहे हैं, और यह हम पर है कि हमको इनमें से सच का कौन सा संस्करण देखना है। जिसे जो सच सूट करता है वो वही सच आपके सामने रख देता है आपके आंख और कान भी उसी सच तो देखना और सुनना चाहते हैं जो आपको पसंद है, आपकी आंखों और कानों के रास्ते संक्रमित सत्य का यह वायरस आपकी नसों में पहुंचाया जा रहा है और यह महामारी तो अब आने वाले दौर में ओर अधिक कोरोना से खतरनाक बन चुकी है। इसलिए इस समय पूरी दुनिया को कोविड-19 की वैक्सीन के साथ साथ सत्य की वैक्सीन की भी जरूरत है लेकिन इन सबके बीच हमें यह नहीं भूलना है कि सच का कोई पक्ष नहीं होता और सच निष्पक्ष होता है।
इस समय मीडिया में खबरों की फरमाइशी चित्रहार दिखाया जा रहा है एवं इस चित्रहार को हर हफ्ते आने वाली टीआरपी देखकर तैयार किया जाता है व यह टीआरपी इस बात पर निर्भर करती है कि एक दर्शक के तौर पर हम क्या देखना पसंद कर रहे हैं। टीआरपी नहीं बल्कि विश्वसनीयता को सफलता का पैमाना बनाना चाहिए, असत्य और मनोरंजन भरी नौटंकी दम पर हासिल की गई टीआरपी और सच्ची खबरों के दम पर हासिल की गई विश्नसनीयता की तुलना नहीं की जा सकती। विश्नसनीयता का कोई विकल्प ही नहीं होता और यह बातें दर्शकों को ही नहीं, बल्कि मीडिया को भी नहीं भूलनी चाहिए। बहरहाल कुछ लोग हर खबर को सिर्फ प्रोपेगेंडा का आधार बना लेते हैं जब सीबीआई का फैसला इन्हें पसंद नहीं आता, तो यह कहते हैं कि सीबीआई बिकी हुई है, जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला इन्हें पसंद नहीं आता तो यह कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट बिक गया है और जब नेता चुनाव हार जाते हैं तो यह ऐसे ही आरोप चुनाव आयोग और वोटिंग मशीनों पर लगाने लगते हैं। यानी जब इन्हें सच सूट नही करता तो यह उस सत्य को ही झूठा साबित करने लगते हैं। पुलिस ने फेक टीआरपी रैकेट का पर्दाफाश किया है जिसमें तीन चैनलों के नाम सामने आए हैं जिसमें रिपब्लिक भारत, बॉक्स सिनेमा और फक्त मराठी शामिल हैं। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि यह टीवी चैनल पैसा देकर टीआरपी को मैन्युपुलेट करने का काम कर रहे थे। पुलिस के मुताबिक रिपब्लिक टीवी पैसा देकर टीआरपी बढ़ाता है। जिसके बाद चैनल के डायरेक्‍टर के खिलाफ कार्रवाई होगी और चैनल के खातों की भी जांच की जाएगी तथा टीआरपी वह होती है जिससे यह पता चलता है कि किस चैनल या किस शो को ज्यादा देखे जा रहा है। सभी चैनलों की रेटिंग जानने के लिए अलग-अलग शहरों में खास तरह के मीटर लगे हुए हैं। यह मीटर घरों पर नहीं लगाए जाते बल्कि शहर की किसी खास जगह पर लगाए जाते हैं। जिसे खुफिया रखा जाता है। अब यही अलग-अलग शहरों में लगाए गए मीटर अपने-अपने इलाकों के सेटटॉप बॉक्स से कनेक्ट रहते हैं और जिस चैनल को जितने ज्यादा लोग देखेंगे, जितने ज्यादा वक्त तक देखेंगे, उनकी तमाम रिपोर्ट अपनी मॉनिटरिंग टीम को भेजते रहते हैं। मॉनिटरिंग टीम इस डाटा की बुनियाद पर एनालिसिस करती है और फिर यह डेटा आम कर दिया जाता है। जिससे टीआरपी कहा जाता है।
किसी भी चैनल की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा इश्तिहार होते हैं। यही वही इश्तिहार होते हैं जो किसी शो के दौरान 1-2 मिनट के लिए चलाए जाते हैं। इश्तिहार वाली कंपनियां टीवी चैनल को इश्तिहार दिखाने के पैसे देती हैं और जिस चैनल की टीआरपी ज्यादा होगी उस चैनल पर इश्तिहार दिखाने के उतने ही ज्यादा पैसे अदा करने पड़ते हैं। टीआरपी को कैलकुलेट करने वाली एजेंसी बीऐआरसी से जुड़ी एक हंसा नाम की एजेंसी पर शिकंजा कसा। देश भर में 3000 से ज्यादा पैरामीटर्स, मुंबई में तकरीबन 2000 पैरामीटर्स के मेंटेनेंस का जिम्मा बीऐआरसी से जुड़ी एजेंसी हंसा को दिया गया था जो टीआरपी के साथ छेड़छाड़ कर रही थी। जिन घरों में यह कॉन्फिडेंशियल पैरामीटर्स लगाए गए थे उस डेटा को किसी चैनल के साथ शेयर कर उनके साथ टीआरपी को छेड़छाड़ किया गया। इन घरों में एक खास चैनल को ही लगाकर रखने के लिए कहा गया था जिसके बदले में उन्हें पैसे दिए जाते थे। इस मामले में पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया और अदालत में पेश किया गया। गिरफ्तार किए गए शख्स के बैंक अकाउंट से तकरीबन 10 लाख और 8 लाख नगद बरामद किए गए। तीन चैनलों की जानकारी मिली जिनमें से दो छोटे चैनल हैं। और यह डेटा को कॉम्प्रमाइज कर रहे थे। पैसा देकर टीआरपी को मैन्युपुलेट करने का काम कर रहे थे। विशेष चैनल को ऑन करने के लिए कहा जाता था। अनपढ़ लोगों के घरों में इंग्लिश के चैनल को ऑन करने की भी डील की गई थी। जिसमें महीना फिक्स था। लोगों के घरों में पैसा देते थे और 20 लाख रुपये एक अकाउंट से सीज किए गए। एक आदमी से 8 लाख कैश बैंक लॉकर से रिकवरी हुई है व 409, 420 IPC के तहत केस दर्ज किया गया था। पिछले कुछ दिनों से अलग-अलग केसों से संबंधित न्यूज़ शेयर किए थे। फेक अकाउंट, एजेंडा चलाया जा रहा था। जिसका क्राइम ब्रांच ने पर्दाफाश किया है। टीआरपी प्‍वाइंट में बदलाव होता है तो इसका सीधा असर रेवेन्‍यू पर पड़ता है।
पुलिस का कहना है कि चैनल के लोग जो जिम्‍मेदार हैं। वो हमारे जांच के दायरे में आएंगे। उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। और अगर इन तीन चैनल के अलावा भी कोई शक के दायरे में आता है तो उसकी भी जांच की जाएगी। सूचना और प्रसारण मंत्रालय से समस्‍त विवरण शेयर किया जा रहा है और औऱ आगे की कार्रवाई के लिए आग्रह किया जा रहा है।
-निधि जैन

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