सात करोड़ की छिपकलियां

 हालही में पश्चिम बंगाल में सात करोड़ की 14 छिपकलियां मिली हैं। सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ के जवानों ने दुर्लभ प्रजाति की इन छिपकलियों को बरामद किया है। और छिपकलियां टेको गेको प्रजाति की हैं। व इन्हें टोके गेको भी कहा जाता है एंव इनकी कीमत करीब सात करोड़ रुपये है। छिपकलियों को उत्तर 24 परगना जिला के भारत-बांग्लादेश सीमा के पास से बरामद किया गया है। बहरहाल, बीएसएफ ने बताया की बीएसएफ की 27वीं बटालियन के जवानों ने सीमा चौकी पारगुमटी अंतर्गत भारत-बांग्लादेश सीमा के पास एक व्यक्ति की संदिग्ध गतिविधि देखी।

जो कि बांग्लादेश से भारतीय सीमा में घुस आया था और फिर जब बीएसएफ के जवान उसकी ओर बढ़े, तो वह वापस बांग्लादेश की ओर से भाग गया। और जब इलाके की तलाशी लेने पर बीएसएफ के जवानों को प्लास्टिक का एक पैकेट मिला, जिसमें छिपकलियां रखी हुई थीं। और भारत में इन दुर्लभ प्रजाति की छिपकलियों को रखना या इनका व्यापार करना भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची 4 के तहत एक बहुत बड़ा अपराध है। ऐसा करने वाले को तीन से सात वर्ष के कारावास की सजा हो सकती है। वैसे बरामद की गयीं छिपकलियों को वन विभाग को सौंप दिया गया है। व जानकारों का कहना है कि, टेको गेको या टोके टोके गेको प्रजाति की छिपकलियां सबसे ज्यादा एशिया में ही पायी जाती हैं। एंव दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों मेंं इसे अच्छी किस्मत और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। इसलिए लोग इसे पालते भी हैं। गौरतलब है कि, इन छिपकलियों की तस्करी दवा बनाने के लिए भी की जाती है। और ऐसा भी माना जाता है कि इन छिपकलियों से बनायी गयी दवा किडनी और फेफड़े को मजबूत बनाती है व इन छिपकलियों से तेल भी बनाया जाता है। इतना ही नहीं, बताते हैं कि इस खास प्रजाति की छिपकली का इस्तेमाल मर्दानगी बढ़ाने वाली दवाइयां बनाने में भी होता है। इस छिपकली के मीट से डायबिटीज, नपुंसकता, एड्स और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के लिए दवाइयां बनायी जाती हैं इसलिए यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी काफी मांग है।
इसलिए इसकी कीमत भी बहुत ज्यादा है। उत्तर-पूर्वी राज्यों से पकड़कर दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में इसकी तस्करी की जाती है। तथा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में मांग वाली इस विशेष प्रजाति की छिपकलियां पूर्वोत्तर भारत के अलावा इंडोनेशिया, बांग्लादेश, फिलीपींस और नेपाल में भी पायी जाती हैं और एक छिपकली की कीमत एक करोड़ रुपये तक बतायी जाती है। वैसे तस्कर इस वन्य जीव को पकड़ने के बाद उसकी आंत निकाल लेते हैं फिर सुखाकर इसे विदेशों में भेज दिया जाता है। 
बहरहाल, नेपाल और भूटान सीमा से भी टोके गेको छिपकलियों की तस्करी की जाती है। भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा पर सीमा सुरक्षा बल यानी एसएसबी को तैनात किया गया है, जो वन्यजीवों की तस्करी रोकने का काम भी करते हैं। नेपाल और भूटान से सटे भारतीय सीमा के सभी वन क्षेत्रों में 120 बाहरी सीमा चौकियां बनायी गयी हैं। गौरतलब है कि, चीन और कोरिया के कोरिया के अरबपति इस छिपकली को खरीदते हैं और उनका मानना है कि, इसकी मदद से अब तक की लाइलाज बीमारी एचआइवी को ठीक किया जा सकता है। और कहा जाता है कि इसकी जीभ से बनी दवाई से एचआइवी रोगी को ठीक किया जा सकता है। इसलिए चीन और कोरिया के बाजारों में इसकी मांग भी अच्छी है और कीमत भी अच्छी मिल जाती है। ताइवान, हांगकांग, वियतनाम समेत कई देशों में इसकी तस्करी होती है। इन सब के बावजूद एसी तस्करी पर अवश्य ही रोक लगनी चाहिए और सरकार को इस के खिलाफ जल्द से जल्द एक अहम कदम उठाना होगा।
-निधि जैन

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