अपराध अभी भी जिंदा है

 पांच लाख इनामी गैंगस्टर विकास दुबे मारा गया। लेकिन उसकी मौत के साथ ही कई सवाल भी दफन हो गए। दुबे एनकाउंटर में जो पुलिस ने थ्योरी दी है, बेशक़ उस पर विश्वास करना असंभव ही है।

वास्तविकता, में पुलिस को अधिकार है कि वह अपने आत्मरक्षा में गोली चला सकते है, लेकिन वाजिब फोर्स के उपयोग की इजाजत भी है। परंतु अब विकास की मौत को लेकर जो सवाल उठाए जा रहे हैं उस पर कोर्ट में पुलिस को यह साबित करना होगा कि सच में उन पर जानलेवा हमला हुआ और इसी कारण अपने बचाव में उन्होंने गोली चलाई। सीआरपीसी की धारा-46 के तहत पुलिस को गिरफ्तारी के वक्त न्यूटन फोर्स के इस्तमाल की इजाज़त होती है। साथ ही आईपीसी की धारा-100 के तहत सेल्फ डिफेंस का सबको अधिकार मिला हुआ है। जिसके मुताबिक इन दोनों ही प्रावधान के तहत पुलिस गिरफ्त से भागने वाले या पुलिस पर हमला करने वाले आरोपी के खिलाफ पुलिस एक्शन ले सकती है, लेकिन वह एक्शन वाजिब होना अनिवार्य है।
गौरतलब है कि, विकास दुबे इनकाउंटर के केस में जो सवाल उठ रहे हैं, उन पर एफआईआर करना और मामले की स्वतंत्र जांच होनी जरुरी है ताकि सच सामने आ सके। तथा बेहद कम वक्त में करोड़पति बने गैंगस्टर विकास के फंड़ मैनेजर की भी अब इनकम टेक्स विभाग द्वारा काली कमाई की जांच होगी। वैसे तो विकास पर मनी लॉन्रड़िग का भी शक है, तो हो सकता है, कि ऐसे में ईडी की भी जांच में सहायता ली जाए। क्योंकि अब पता चला है कि विकास और उसके करीबियों की दुबई से लेकर कई दूसरे देशों में करोड़ों की प्रॉपर्टी है। व आठ माह पूर्व ही आरोपी ने लखनऊ में पांच करोड़ की एक प्रॉपर्टी भी खरीदी थी। एंव कुल मिलाकर गैंगस्टर के पास बारह मकान और इक्कीस फ्लैट्स होने का पता चला है। बहरहाल, कई सवाल हमारे चारों तरफ घूम रहे है परन्तु हम जान बूझ कर उन सवालों से मुंह फेर रहे है, क्योंकि हमें पता है जब भी हम उन सवालों के लिए आवाज उठाएंगे तब हमारा विरोध होने लगेगा।
तो इसलिए अच्छा है कि हम मौन रहे।और यही बात भारत के लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी खतरे की घंटी साबित होगी। क्योंकि जिस मुद्दे पर हम लोगों को आवाज उठानी होती है उन पर ही हम शांत रहते हैं। पर अगर आज के दौर में देखा जाए तो मीडिया को भी जो सवाल पूछना चाहिए। वह भी वह सवाल नहीं पूछ सकते क्योंकि अगर उन्होंने भी सवाल उठाए तो विरोधी दल उन पर ही एफआईआर का मुकदमा डाल देते हैं। इस समय खुंखार अपराधी दुबे का एनकाउंटर हो गया है, जिस पर जनता खुश परंतु आरोपी के इनकाउंटर के साथ ही कई सवाल उपजे है। सबसे बड़ा तो सवाल यह ही है, कि यह इनकाउंटर वास्तविक में हुआ भी है या यह प्लान इनकाउंटर था। क्योंकि यह इनकाउंटर सुनने के बाद ऐसा ही लगा कि हम कोई फिल्म की स्टोरी सुन रहे है। गौरतलब है कि, असल जिंदगी और फिल्म में काफी फर्क होता है।
परंतु विकास इनकाउंटर के बाद तो यह ही लग रहा है कि सड़क पर इंसाफ करना सही है क्योंकि इस पर लोग जश्न मना रहे हैं व अपनी तालियों से सहमति दे रहे हैं। कहने को तो विकास खूंखार अपराधी है जिससे किसी को भी सहानुभूति नहीं हो सकती क्योंकि उसने आठ पुलिसकर्मी को मारने से पहले एक बार भी नहीं सोचा और इससे पहले भी उसने ठाना में घुसकर एक पुलिस वाले को मारा था। जिसके खिलाफ अभी तक उस पर कोई कारवाई नहीं हुई थी। लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि अब सड़क पर ही इंसाफ मिलने लगेगा। और अगर ऐसा होने लगा तो न्यायालय, न्यायाधीश व वकीलों की तो जरुरत ही नहीं पड़ेगी। एंव मिटा देने चाहिए संविधान में लिखी उन सारी धाराओं को जो लोगों के हक के लिए उनको इंसाफ दिलाने के लिए बनाई गई थी। यकीनन भारत में इंसाफ के लिए, विकास को खामोश करना मकसद नहीं था, मकसद तो यह होना चाहिए था कि किसी भी तरह हम इस पर प्रतिबंध लगा सके कि विकास जैसे अपराधी हमारे देश में पैदा ही नहीं होते। अब ना जाने पता नहीं कितने खाकी और खादी वाले विकास की मौत से खुश होंगे क्योंकि उनका गुनाह तो अब बेनकाब होने से बच गया और अब पता नहीं ओर कितने विकास दुबे पैदा होते रहेंगे हमारे सिस्टम में।अब यह तो बस सवाल बनकर ही रह गया है कि क्या अब खुलासा हो भी पाएगा कि कितने खाकी और खादी वाले गिरगिट बनकर देश के लोकतंत्र में दीमक की तरह लगे हुए हैं।
क्या अब उनके नाम कभी भी बेनकाब हो पाएंगे? उन पर कभी कार्रवाई हो पाएगी? हकीकत में तो इस एनकाउंटर में सिर्फ एक ही आदमी मारा गया है परंतु उसी के जैसे हजारों अपराधी देश में खुलेआम घूम रहे हैं। बिना किसी पाबंदी के, बिना किसी डर के। क्योंकि देश में से सिर्फ एक अपराधी ही तो गया है, अपराध तो यकीनन अभी भी जिंदा है।
-निधि जैन

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