हत्या या आत्महत्या

 रात हो या दिन, बरसात हो या धूप, घर से दूर रहकर समाज को सटीक खबरें दिखाते हैं। अपनों से दूर होकर देश को सच्चाई से रुबरु कराते हैं। यूं ही नहीं कहते इन्हें देश का चौथा स्तम्भ।

पत्रकार बनाने के लिए कई बार सच के लिए शोषित होना पड़ता है, सच्चाई की खोज में अनजानी राहों पर चलना पड़ता है, धन से वंचित सरस्वती की अराधना करनी पड़ती है, आंदोलन से गुजरना पड़ता है, थप्पड़ तो कभी धक्के खाने पड़ते हैं। इतना सरल नहीं होता पत्रकार का जीवन अपनी कलम से राष्ट्र की प्रगति के लिए निष्पक्ष होकर लिखना पड़ता है। अपनी जान जोखिम में डालकर फ्रंट लाइन से समाचार देते हैं। तो ऐसे में अगर जब पत्रकारों की एक छोटी सी मांग है कि उनके साथी तरुण सिसोदिया की रहस्यमय हालत में हुईं मौत की जांच हो। तो तब सरकार को सच सामने लाने के लिए जल्द से जल्द कारवाई पूर्ण करनी चाहिए।
क्योंकि पत्रकार तरुण की मौत का सच क्या है यह जल्द सामने आना चाहिए। एम्स में कोरोना का इलाज करा रहे पत्रकार तरुण की मौत का सच्च आखिर क्या है? उन्होंने खुद कई बार सोशल मीडिया पर अपनी हत्या की आशंका जताई थी। जिसके बाद उनकी मौत हो जाने पर कई सवाल अपने आप ही खड़े हो जाते हैं। वैसे तो एम्स प्रशासन और पुलिस का कहना है कि यह मामला आत्महत्या का ही है। लेकिन जिस तरह प्रशासन ने बताया की तरूण एम्स अस्पताल में 24 जून को ट्रॉमा सेंटर में एडमिट हुए थे। व वह कोरोना से पीड़ित थे। लेकिन उपचार के साथ उनमें सुधार भी हो रहा था। उन्हीं आईसीयू में भी रखा गया था। पर सोमवार को उन्हे वार्ड़ में शिफ्ट किया जाना था। परंतु, इसी बीच वह सोमवार को दोपहर करीब 1:55 बजे अचानक टीसी-1 वार्ड़ से भागे। अस्पताल में मौजूदा लोग भी उनके पीछे भागे लेकिन वह भाग कर चौथी मंजिल पर पहुंच गए और उन्होंने खिड़की का शीशा तोड़ कर वहां से छलांग मारकर आत्महत्या कर ली। जिसके बाद वह बुरी तरह से घायल हो गए थे उन्हें तुरंत ही अस्पताल ले जाया गया लेकिन 3:55 समय उनकी मौत हो गई।
हैरानी वाली बात यह है कि, तरुण आखिर अपने वार्ड से भागे ही क्यों? क्या परेशानी आ गई थी उन्हें कि उन्हें आत्महत्या करने की सोची। क्या वह एम्स प्रशासन से परेशान थे। या कोई और परेशानी थी। बहरहाल, एम्स प्रशासन ने तो साफ कह दिया की यह आत्महत्या का ही केस है। लेकिन आत्महत्या को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं क्योंकि तरुण ने बीते दिनों ही एम्स में चल रही गड़बड़ी की शिकायत स्वास्थ मंत्रालय में की थी। जिसके बाद जांच के आदेश दिए गए थे। जबसे ही तरुण को अपनी हत्या की आशंका थी। जिसके बारे में कई बार उन्होंने सोशल मीडिया पर व अपने परिजनों से कहा था। परंतु इन अटकलों के बीच ही उन्हें आईसूयू में भर्ती करा दिया गया व उनसे उनका फोन भी ले लिया गया ताकि वह किसी से भी बात नहीं कर सके एंव अस्पताल में चल रही गड़बड़ी की खबर बहार नहीं दे सके। तब उनकी मौत के बाद उनके घर वालों ने हत्या की आशंका जताई थी। परंतु गौरतलब यह है कि, जब तरुण ने खुदखुशी करने की कोशिश करी तो एम्स प्रशासन कहां था उन्हें किसी ने एक बार भी रोकने का प्रयास क्यों नहीं करा। तथा मौत से तीन दिन पहले तरुण ने अपने पड़ोसी को मैसेज कर कहा था कि यह उनका अंतिम मैसेज है क्योंकि उन्हें पूरी आशंका है कि उनकी हत्या होने वाली है। व अस्पताल में चल रही गडबड़ी की भी पूरी जानकारी तरुण ने अपने दोस्त को दी थी और बताया था कि उपचार के दौरान डॉक्टर किसी को भी कोई सा भी इंजेक्शन लगा रहे हैं। एंव उपचार में बहुत ज्यादा लापरवाही कर रहे हैं।
परंतु चिंतापूर्ण विषय यह है कि, अगर देश के चौथे स्तम्भ के साथ ही ऐसा होगा की किसी की शिकायत करने पर, सच्च सामने लाने की कोशिश पर उसकी जान ले ली जाएगी तो बेनकाबों के चेहरे पर से पर्दा कैसे हटेगा। तथा सरकार को जल्द से जल्द मामले की सुनवाई करनी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके। व जल्द से जल्द स्वतंत्र नायिक जांच होनी चाहिए। तभी पता चलेगा की दैनिक भास्कर के पत्रकार तरुण सिसोदिया की मौत कैसे हुई, किन हालातों में हुई और टॉमा सेंटर को लेकर उठे सवाल का सच क्या है, इसके लिए नायिक जांच बेहद जरुरी है। तथा तरुण को न्याय दिलाने के लिए बीते दिनों तरुण के परिजनों व तमाम जर्नलिस्ट ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के बाहर तरूण को इंसाफ दिलाने के लिए भी शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट किया था।
एंव व्हाट्सएप पर जस्टिस फॉर तरूण नाम का भी ग्रुप बनाया गया है जिसमें विभिन्न विशाल पत्रकार भी शामिल है। और तरुण को न्याय दिलाने के लिए वरिष्ठ पत्रकारों से लेकर उनके दोस्तों ने सोशल मीडिया के माध्यम से हत्या या आत्महत्या के सवाल पर पर्दा उठाने के लिए उच्चस्तरीय जांच की मांग की हैं।
-निधि जैन

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वर्ष 2020 की यादें

अब कावासाकी से भी लड़ना है

चीन में कोरोना की वापसी