कौन होगा देश का अगला राष्ट्रपति?

शरद पवार, नीतीश कुमार, मायावती, आरिफ मोहम्मद खान से लेकर अमरिंदर सिंह जैसे दिग्गज नेताओं के नामों की चर्चा है इस बार होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में।

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल 24 जुलाई को खत्म हो रहा है और संविधान के अनुसार, नए राष्ट्रपति का चुनाव उससे पहले पूरा हो जाना चाहिए। इसलिए चुनाव आयोग ने, 29 जून तक नामांकन, 18 जुलाई को मतदान और 21 जुलाई, को 16 वें राष्ट्रपति के नाम की घोषणा करने को कहा है। राष्ट्रपति चुनाव के लिए, कुल वेटेज 10,80,131 है एवं जिस उम्मीदवार को 5,40,065 से अधिक वेटेज मिलेंगे, वो राष्ट्रपति के पद पर नियुक्त होगा।
बहरहाल आगामी आम चुनाव 2024 में होने हैं और उसमें कई निर्णायक क्षणों में, राष्ट्रपति की महत्वपूर्ण भूमिका के मद्देनजर, राष्ट्रपति चुनाव के संभावित उम्मीदवार पर सरकार और विपक्षी दलों में गहमागहमी तेज हो गई है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी ने पार्टी प्रमुख जेपी नड्डा और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को राजनातिक दलों और निर्दलीय सांसदों के साथ बातचीत के लिए अधिकृत किया है तो वहीं विपक्ष के वरिष्ठ कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खाड़गे व कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने टीएमसी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के अलावा एनसीपी प्रमुख शरद पवार और सीपीआईएम के सीताराम येचुरी से राष्ट्रपति पद के लिए संयुक्त उम्मीदवार को लेकर बात की है। 15 जून को ममता बैनर्जी ने दिल्ली के कंस्टीट्यूशन क्लब में सभी प्रोग्रेसिव विपक्षी शक्तियों की बैठक बुलाई थी लेकिन विपक्ष में बिखराव, एकता की कमी, किसी विषय पर आपस में लीड लेने की होड़ में, कई मानकों में प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी की मजूबत स्थिति को दशार्ती है।
ऐसे वक्त में, जब राष्ट्रपति चुनाव नजदीक हैं व भारतीय जनता पार्टी दिन-प्रतिदिन मजबूत होती जा रहीं है तब तो यह मौका विपक्षी दलों के लिए खास है आपस में बात करने और भारतीय राजनीति के भविष्य के रास्ते को तय करने का परन्तु जब तक पूरी दृढ़ता से सभी दल पूर्ण रूप से साथ नहीं आते है तब तक विपक्ष की स्थिति मुश्किल ही है।
गौरतलब है कि 10.86 लाख के वेटेज वाले इलेक्टोरल कॉलेज में बीजेपी और साथी दलों के पास 50 प्रतिशत से कम वोट हैं और अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए उन्हें वायएसआर कांग्रेस और बीजेडी जैसे दलों की जरूरत पड़ेगी। आंकड़ों के मुताबिक, 48 प्रतिशत इलेक्टोरल कॉलेज वोट एनडीए के साथ हैं, 38 प्रतिशत कॉलेज वोट यूपीए के साथ हैं, 14 प्रतिशत के करीब जगन रेड्डी की पार्टी, बीजेडी, टीएमसी और लेफ़्ट के साथ है यानी पूर्ण विपक्ष के पास 52 प्रतिशत इलेक्टोरल कॉलेज वोट हैं और अगर किसी तरह सारा विपक्षी वोट एकजुट रहे तो एक लड़ाई हो सकती है लेकिन ऐसा होना अभी तक तो असम्भव ही हैं।
हालांकि अगर विपक्ष समय रहते एकजुट हो भी जाता है तो भी भाजपा तो माहिर है पार्टी के भीतर तोड़-फोड़ करने में। कोई गैर-हाजिÞर होगा ही या तो कोई क्रॉस वोटिंग कर देंगा, जैसा    हमने हालिया राज्यसभा चुनाव में देखा। विपक्ष जिस स्थिति में है, ऐसे समय में उन्हें मजबूत कदम उठाने वाला व्यक्ति चाहिए। जो पूर्ण विपक्षी दलों में सामंजस्य बिठा सकें लेकिन इस समय, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को खड़ा करना एक बहुत बड़ी जिÞम्मेदारी है, जो अभी कोई नहीं उठाना चाहता है और वैसे भी जब एक पक्ष के पास 48 प्रतिशत वोट है और 52 प्रतिशत विपक्षी दलों के पास, पर इन्हें साथ खड़ा करना काल्पनिक ही है।
-निधि जैन

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