भयावह हो रहा आंदोलन
किसान आंदोलन के ज़रिए देश विरोधी ताकतें देश को कैसे कमज़ोर करना चाहती हैं। यह तो अब भारत में स्पष्ट नजर आ रहा हैं। बहरहाल आज से करीब सवा दो सौ साल पहले जब भारत में अंग्रेज़ों के शासन की शुरुआत हुई थी तो तब उससे पहले दुनिया की GDP में भारत की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत हुआ करती थी। जिसमें सबसे बड़ी भूमिका भारत के किसानों की थी। भारत के किसान जो भी उगाते थे।
उसकी मांग पूरी दुनिया में हुआ करती थी लेकिन जब 1947 में अंग्रेज़ भारत से गए तब दुनिया की GDP में भारत की हिस्सेदारी घटकर 4 प्रतिशत से भी कम हो गई। जिससे सबसे बुरा हाल देश के किसानों का हुआ था और यह इसलिए हुआ था क्योंकि अंग्रेज़ों ने भारत के लोगों में फूट डाल दी थी। धर्म के नाम पर लोग आपस में लड़ने लगे थे। जिस मौके का फ़ायदा अंग्रज़ों ने उठाया। अंग्रेजों ने किसानों का ज़बरदस्त शोषण शुरू कर दिया। जिससे अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ क्रांति कमज़ोर पड़ने लगी तथा देश को बांटने वालों ने क्रांति में नफ़रत की मिलावट कर दी थी और इसमें अंग्रेज़ों का साथ दे रहे थे वह लोग, जो देश के टुकड़े टुकड़े करना चाहते थे व आख़िरकार 15 अगस्त 1947 को देश के ओरिजनल टुकड़े टुकड़े गैंग का सपना पूरा भी हो गया और भारत दो हिस्सों में बंट गया लेकिन चिंता पूर्ण विषय तो यह है कि आज दो सौ वर्षों के बाद भी स्थिति बदली हुई नहीं लग रही है। आज भी देश का किसान सड़कों पर आंदोलन कर रहा है। जो आंदोलन अब धीरे-धीरे शाहीन बाग में बदला जा रहा है। प्रदर्शन वाली जगहों से ऐसे पोस्टर सामने आ रहे हैं जो देश को नुकसान पहुंचाने के आरोप में इस समय देश की अलग अलग जेलों में बंद हैं। जिनमें टुकड़े टुकड़े गैंग के लोग भी शामिल हैं।जेएनयू को देश विरोधी ताकतों का गढ़ बनाने वाले लोग भी हैं। अर्बन नक्सली भी हैं, दिल्ली दंगों की साज़िश करने वाले भी हैं, खालिस्तानी भी हैं, अवाॅर्ड वापसी गैंग भी है, नए नागरिकता कानून का विरोध करने वाले भी हैं और कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध करने वाले भी हैं। उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, वरवरा राव, जीएन साईं बाबा, और सुधा भारद्वाज जैसे लोगों के नाम शामिल हैं।किसी पर भीमा कोरोगांव में हिंसा भड़काने का आरोप है तो कई दिल्ली दंगों की साज़िश के आरोप में जेल में बंद है जिससे यह स्पष्ट है कि इनमें से ज़्यादातर लोग देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं लेकिन इसे नज़रअंदाज़ करते हुए भोले भाले किसानों के हाथ में इनकी तस्वीरों वाले पोस्टर्स पकड़ा दिए गए। जाहिर है कि इनमें से ज़्यादातर किसानों को शायद अंदाज़ा भी नहीं होगा कि जिन लोगों की रिहाई की मांग वो कर रहे हैं उन पर कितने गंभीर आरोप दर्ज हैं। कुल मिलाकर किसानों के इस आंदोलन में बात बात पर प्रदर्शन करने वाले उन परजीवी प्रदर्शनकारियों की एंट्री हो चुकी है जो देश के हर आंदोलन को शाहीन बाग में बदलना चाहते हैं और आंदोलन कर रहे किसानों को शायद इस बात का एहसास भी नहीं होगा कि यह लोग देश के लिए खून पसीना बहाने वाले किसानों का खून चूसकर खुद को शक्तिशाली बना रहे हैं। गौरतलब है कि एक तरफ़ देश विरोधी ताक़तें इस आंदोलन को हाईजैक करने का प्रयास कर रही हैं तो दूसरी तरफ़ इस आंदोलन के नाम पर देश के लोगों को बंधक बनाया जा रहा है। दिल्ली जयपुर और दिल्ली आगरा हाईवे को जाम करना, देश भर के टोल नाकों को फ्री करना, सभी ज़िलों में धरना प्रदर्शन करना, ट्रेन रूकवाना आखिरकार यह सब क्यूं किया जा रहा है और सोचने वाली बात तो यह है कि यह सब तब हो रहा है जब सरकार लिखित तौर पर किसानों की मांगों पर गौर करने का आश्वासन दे चुकी हैं।
अब तो ऐसा ही लग रहा है कि आने वाले कुछ दिन बहुत मुश्किल भरे हो सकते हैं लेकिन किसानों को भी एक बात समझनी चाहिए कि अभी मौजूदा स्थिति में तो देश का मूड किसानों के साथ है, चाहे किसानों की मांगे सही हों या ग़लत, देश के लोग किसानों के साथ हमदर्दी दिखा रहें है परन्तु अगर यह आंदोलन शहरों को बंधक बनाने के फॉर्मूले पर ही चलता रहा तो इससे देश के लोगों की नाराज़गी बढ़ सकती हैं।
आंदोलन के कारण देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित नहीं होनी चाहिए अगर अर्थव्यवस्था ठप हो जाएगी तो देश के लोगों के साथ साथ खुद किसानों का भी नुकसान होगा।हमें यह अवश्य सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे किसी फैसले से देश की विरोधी ताकतों को तो फायदा नहीं उठ रहा। कनाडा और अमेरिका में कृषि कानूनों का समर्थन किया जा रहा हैं, किसानों के समर्थन में रैलियां निकाली जा रही है लेकिन भयावह यह है कि इन रैलियों में खालिस्तान के झंडे नज़र आ रहे हैं। इतना ही नहीं, इन लोगों ने वहां भारत के उच्चायोग को भी बंद कराने की कोशिश की। हालांकि महाराष्ट्र पुलिस की साइबर सेल ने भी यह ख़ुलासा किया है कि पिछले 15 दिनों में किसान आंदोलन के नाम पर सोशल मीडिया पर करीब 13 हज़ार ऐसे पोस्ट लिखे गए जिनमें खालिस्तान का ज़िक्र है, जिनमें खालिस्तान के लिए हमदर्दी दिखाई गई है या फिर खालिस्तान की मांग की गई है।
जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि कैसे दुनिया भर के देशों की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया पर खालिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है। इसमें कोई दोहराया नहीं है कि किसानों को उनका हक़ मिलना चाहिए लेकिन कृषक आंदोलन अलगाववादियों और आतंकवादियों के हाथ का मोहरा नहीं बनना चाहिए। विरोध प्रदर्शन करना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन आंदोलन की आड़ में जिस तरह से देश को कमज़ोर करने की कोशिश की जा रही है उससे देश को सावधान रहना चाहिए।
-निधि जैन