भावनाएं हीन भाषाएं!
भारत में जहां औसतन 20 किलोमीटर के बाद भाषा और बोलियां बदल जाती हैं, वहीं अंग्रेज़ी भाषा का तो फ्यूचर ब्राइट नज़र आ रहा है, लेकिन भारतीय भाषाओं के मामले में यह स्थिति बहुत ख़राब है। 21 फरवरी को दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया था। वर्ष 1999 में पहली बार संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNESCO ने इसे मनाने की घोषणा की थी और वर्ष 2000 से हर साल ये एक दिन मातृभाषा को समर्पित होता है परन्तु आज का कड़वा सच तो ये है कि हर 14 दिन में दुनिया में एक भाषा विलुप्त हो जाती है।
हमारे देश में बच्चों को अंग्रेज़ी की कविता तो याद रहती है, लेकिन वो ही अपनी मातृभाषा में बोली जाने वाले कहानियों और कविताओं को याद नहीं रखते। अंग्रेज़ी बोलना, पढ़ना और लिखना एक स्टेटस सिंबल बन गया है। हिन्दी के नमस्ते से ज़्यादा हमें अंग्रेज़ी का शब्द हैलो बोलना अच्छा और कूल लगता है। वहीं हमारे ही समाज में ये बातें भी बोली जाती हैं कि अंग्रेज़ी सीख ली तो नौकरी भी मिल जाएगी और सम्मान भी जिसका स्पष्ट मतलब है कि आज अगर भाषाओं का विश्वयुद्ध हुआ तो भारत की हिन्दी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी और उड़िया जैसी भाषाएं बिना लड़े ही हार जाएंगी जो कि एक बहुत बड़ा सच है। 2011 की जनगणना के मुताबिक़, भारत में 19 हज़ार 500 भाषाएं और बोलियां मौजूद हैं, जिनमें से 15 प्रतिशत यानी लगभग तीन हज़ार भाषाएं विलुप्त होने की कगार पर खड़ी हैं यानी इन भाषाओं को बोलने वाले लोग 100 से भी कम हैं। UNESCO के मुताबिक़, भाषाओं का विलुप्त होने की चार वजहे हैं- गरीबी, पलायन, नौकरी से निकाले जाना और भाषा की पूरी जानकारी न होना। बहरहाल ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ भारत में भाषाओं को लेकर यह स्थिति है। अंग्रेज़ी और दूसरी भाषाओं के बढ़ते प्रभाव की वजह से कई देशों में भी बोली जाने वाली क्षेत्रीय भाषाएं विलुप्त हो रही हैं।दुनियाभर में 6 हज़ार 700 भाषाएं मौजूद हैं, जिनमें से लगभग 2500 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या 10 हज़ार या उससे भी कम है। 178 भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें 10 से 50 लोग बोलते हैं जबकि 146 भाषाएं हैं ऐसी हैं, जिन्हें बोलने वाले लोग 10 से भी कम बचे हैं। यही नहीं वर्ष 1950 से लेकर अब तक 230 भाषाएं पूरी तरह मर चुकी हैं। गौरतलब है कि इन आंकड़े को हमें एक संदेश की तरह लेना चाहिए कि अगर हमने अपनी मातृभाषा को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई तो वो दिन दूर नहीं होगा जब हम संवाद तो करेंगे लेकिन उस संवाद में भावनाएं नहीं होंगी।
-निधि जैन