जिन्दगी की कीमत इतनी सस्ती भी नहीं!

 जिंदगी हर किसी को असानी से नहीं मिलती और जिसे मिलती है वह उसकी कद्र नहीं करता। हमें जिदंगी खूबसूरत बनानी पढ़ती है, ड़ट कर कठिनाइयों का सामना करना पढ़ता हैं लेकिन कई लोग अपनी सांसों की डोर अपने ही हाथों तोड़ देते हैं। न जाने क्यों लोग आत्महत्या करने की सोचते हैं?

सुनहरी जिदंगी का कारवा हर किसी को नहीं नसीब होता पर न जाने फिर भी लोगों के मन में इसे खत्म करने का ख्याल कहां से आ जाता हैं। भारत में रोजाना मरने वालों का आंकड़ा बढ़ता जा रहा हैं। भारत में आत्महत्या करने वालों का प्रतिशत 2018 के मुकाबले 2019 में 3.4 फीसदी बढ़ा है, वहीं दुर्घटना में मरने वालों का प्रतिशत 2.3 फीसदी बढ़ा है। यह आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी ने जारी किए हैं। वहीं सबसे अधिक खुदकुशी के मामले महाराष्ट्र से आए हैं। देश में की जाने वाली कुल आत्महत्याओं में महाराष्ट्र 13.6 फीसदी के साथ सबसे ऊपर है।
इसके बाद तमिलनाडु 9.7 फीसदी, पश्चिम बंगाल 9.1 प्रतिशत, मध्य प्रदेश 9 फीसदी और कर्नाटक का 8.1 प्रतिशत का योगदान है। इन पांच राज्यों का कुल प्रतिशत 49.5 है वहीं बाकी पचास फीसदी आत्महत्याएं अन्य 24 राज्यों और 7 केंद्रशासित प्रदेशों में होती हैं व अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में आत्महत्या के मामले कम आए हैं तथा देश में हुई कुल आत्महत्याओं में इसका योगदान 3.9 प्रतिशत है।
गौरतलब है कि मैं मरना चाहता हूँ यह बोलने वाले सिर्फ अपनी मुसीबतो से भागते हैं जिसका हल जिंदगी खत्म करना थोड़ी न होता है व पारिवारिक समस्याएं और बीमारी आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह रही हैं। गत वर्षों में हुई कुल आत्महत्याओं 1,39,123 में पारिवारिक समस्या के कारण 32.4 प्रतिशत और बीमारी के कारण 17.1 प्रतिशत लोगों ने खुदकुशी की है। ड्रग एब्यूज यानी लत की वजह से 5.6 प्रतिशत, विवाह संबंधी दिक्कतों के कारण 5.5 प्रतिशत, प्रेम प्रसंग के कारण 4.5 फीसदी, दिवालियापन और कर्ज की वजह से 4.2 फीसदी, परीक्षा में फेल होने और बेरोजगारी की वजह से 2 प्रतिशत, प्रोफेशनल और करियर की दिक्कतों के कारण 1.2 प्रतिशत और प्रॉपर्टी विवादों के कारण 1.1 प्रतिशत लोगों ने आत्महत्या की हैं एवं महिलाओं के मुकाबले पुरुष अधिक आत्महत्या करते हैं। 70.2 प्रतिशत पुरुषों ने और 29.8 फीसदी महिलाओं ने बीते वर्षों में आत्महत्या की है, जबकि 2018 में 68.5 फीसदी पुरुष और 31.5 फीसदी महिलाओं ने खुदकुशी की थी। महिलाओं की आत्महत्या की सबसे बड़ी वजहों में विवाह संबंधी विवाद, खासकर दहेज से जुड़े मामले, नपुंसकता आदि हैं। महिलाओं में सबसे अधिक आत्महत्या घरेलू महिलाओं ने की है। महिलाओं द्वारा की गई कुल खुदकुशी में 51.5 फीसदी गृहणियों का योगदान है। वहीं, 18 साल से कम उम्र के बच्चों में आत्महत्या का कारण पारिवारिक विवाद, परीक्षा में फेल होना, प्रेम प्रसंग और बीमारी हैं अर्थात खुदकुशी, सिर्फ एक इंसान की जान नहीं लेती, बल्कि उससे जुड़ी कई चीजों को गहरा प्रभावित करती है। एक जिंदगी का अंत, उससे जुड़े और प्रेम करने वाले हर एक शख्स के जीवन में शून्यता छोड़ जाती है, और रह जाता है सिर्फ एक सवाल कि बिन कुछ बताए, बिन कुछ बोले यह कैसे चला गया? रिपोर्ट के अनुसार, 2019 में कुल खुदकुशी करने वालों में 66.2 फीसदी ऐसे थे, जिनकी सालाना आय एक लाख रुपये से कम थी व 29.6 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिनकी सालाना आय 1 लाख से पांच लाख रुपये के बीच थी। इसी तरह, 23.3 फीसद पीड़ित ऐसे थे, जिन्होंने मैट्रिकुलेशन, सेकेंडरी स्तर तक की पढ़ाई की थी, वहीं मिडिल लेवल एजुकेशन तक की पढ़ाई करने वाले 19.6 प्रतिशत, अशिक्षित 12.6 फीसदी लोगों ने खुदकुशी की है जबकि स्नातक या उससे ऊपर की पढ़ाई करने वालों का प्रतिशत इसमें 3.7 था। परीक्षा में फेल होना, बेरोजगारी, सामाजिक रुतबा, संपत्ति विवाद, गरीबी, प्रेम संबंध, शारीरिक प्रताड़ना आदि आत्महत्या के बड़े कारण होते हैं, जिन्हें रोका जा सकता है। भारत में आत्महत्या से बचाव के प्रोग्राम चलाए जाने की आवश्यकता है। मानसिक बीमारियां जैसे डिप्रेशन, ड्रग का इस्तेमाल, साइको, बेचैनी, पर्सनैलिटी डिसऑर्डर आदि भी आत्महत्या के बड़े फैक्टर्स होते हैं। मेंटल हेल्थ एक्ट 1987 में मानसिक तौर पर बीमार लोगों के सुधार के लिए कई उपाय तय किए गए थे। जिनमें ऐसे लोग थे जो अपनी जान ले सकते हैं, उन्हें कस्टडी प्रदान करना औऱ मानसिक रोगियों के अधिकारों को संरक्षित करना आदि शामिल हैं। लोगों और समाज की सहभागिता से आत्महत्या के मामलों को कम किया जा सकता है। समुदाय के सहयोग से मानसिक बीमारी, स्वीकार्यता, मुश्किल हालात से निपटने में सहयोग, अल्कोहल और ड्रग के इस्तेमाल को रोकने से राहत मिल सकती है। यही नहीं टेक्नोलॉजी आधारित सुसाइड प्रिवेंशन टूल्स भी काफी कारगर हो सकते हैं। नेशनल सुसाइड प्रिवेंशन हेल्पलाइन द्वारा तैयार एम वाई 3 एप काफी मददगार है। यह एक नेटवर्क तैयार करते है। अगर आपके मन में आत्महत्या का ख्याल आता है तो यह आपको लोगों से जोड़ता है।उल्लेखनीय है कि आज के जीवन में लोग आत्महत्या को सारी समस्या का हल समझते हैं परन्तु जीवन एक सफर है जिसका आनंद लेना चाहिए, वहीं मंजिल तो मौत है जो सबको आनी ही हैं।
मंजिल की ओर दौड़ लगाने से अच्छा है रास्ते का आनंद ले, जीवन में काफी कुछ हासिल करें। हालांकि आत्महत्या हमारे शास्त्रों में घोर अपराद है। आत्महत्या के विचार आने का मतलब है कि आपने हार मान ली है। बहरहाल जब एक दरवाजा बंद होता है, दूसरा खुल जाता है लेकिन अक्सर हम उस बंद दरवाजे को इतने अफ़सोस के साथ देखते हैं कि जो दरवाजा खुला है उसे भी देख नहीं पाते।
-निधि जैन

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