कब बन पाएगी वैक्सीन

 भारत में कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से फैलता जा रहा है। वायरस अपना विकराल रूप धारण करता जा रहा है लेकिन इस बीच सबकी निगाहें बस एक चीज पर ही टिकी हुई है कि कोरोना वैक्सीन कब बन कर तैयार होगी क्योंकि वैक्सीन आने के बाद या कोरोना का संक्रमण खत्म होने के बाद ही लोगों की जिंदगी वापिस से पटरी पर दौड़ेगी।

परन्तु अब एक नई स्टडी में विशेषज्ञों ने इस वायरस के बदलते स्वरुप को पाया है। जो बेशक़ ही बहुत चिंता का विषय है। और अगर यह वायरस बार-बार अपना स्वभाव इसी तरह बदलता रहेगा तो यकीनन वैक्सीन में भी असर व फर्क आएगा और संभव तो यह भी हो सकता है कि वैक्सीन भी इसके संक्रमण को रोक न सके। बहरहाल, एक अध्ययन में पता चला है कि, SARS-CoV-2 वायरस जो कि कोविड़-19 के कारण बनता है। उसके स्पाइक प्रोटीन में कई परिवर्तन हुए हैं और यही प्रोटीन हैं जो वायरस को मानव कोशिकाओं में घुसपैठ करने को भी क्षमता देता है। एंव एकबार जब यह शरीर के अंदर प्रवेश कर लेता है तो यह वहां संक्रमण फैलना शुरू कर देता है, जिससे तमाम तरह की दिक्कतें पैदा होने लगती हैं। तथा जर्नल ऑफ लेबोरेटरी फिजिशियन की इसी एक रिपोर्ट में 1,325 जीनोम, 1,604 स्पाइक प्रोटीन और 279 आंशिक स्पाइक प्रोटीन के विश्लेषण पर ही आधारित था। जो इन जांच नमूनों को एक मई तक अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन यानी एनसीबीएई में रखा गया था और वहीं पर ही इसपर रिसर्च किया गया था।
अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ सरमन सिंह का भी कहना है कि उन्हें स्पाइक प्रोटीन यानी SARS-COV-2 में 12 म्यूटेशन मिले। जिनमें से छह नॉवेल म्यूटेशन थे। वैसे इंडियन स्ट्रेन (MT012098.1) वायरस के संक्रमण में भी आनुवांशिक परिवर्तन पाया गया है। एंव उनका कहना है कि हम नहीं जानते कि यह रोग के विषाणु को कैसे प्रभावित करेगा। व जीनोम से निकाले गए स्पाइक प्रोटीन में अधिकतम आनुवंशिक परिवर्तन देखा गया। और वायरस के अलग-अलग वातावरण के संपर्क में आने पर वह अपनी आनुवंशिक संरचना को बदलने या बदलवाने के लिए जाना जाता है। लेकिन चिंता की बात यह है कि इस मामले में यह परिवर्तन काफी तेजी से हो रहा है और अभी तक शोधकर्ताओं को इस पर कुछ भी जानकारी नहीं है कि यह बीमारी फैलने पर कैसे असर डालेगी या ड़ाल सकती है। वैसे तो इस अध्यनन में कई रिसर्च इंसीट्यूट ने भाग लिया था, जिसमें संक्रामक रोगों और वैश्विक स्वास्थ्य कार्यक्रम में प्रतिरक्षा, मैकगिल विश्वविद्यालय स्वास्थ्य केंद्र के अनुसंधान संस्थान और मैकगिल इंटरनेशनल टीबी सेंटर, कनाडा के विशेषज्ञ भी शामिल थे। और अध्ययन में कहा भी गया था कि स्पाइक प्रोटीन वैक्सीन के विकास का प्रमुख लक्ष्य था परन्तु वैश्विक स्तर पर उपलब्ध सभी जीनोमों में एंटीजेनिक एपिटोप में कई परिवर्तन पाए गए।तथा अध्ययन में भी साफ तौर पर कहा गया है कि छोटी अवधि के भीतर कोविड़-19 वायरस के स्वभाव में परिवर्तन हो सकता है। जो कि पूर्ण रूप से यह दर्शाता है कि, इसके लिए टीका विकसित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो सकता है। और म्यूटेशन भी एक बड़ा कारण हो सकता है जोकि आपके शरीर में एंटीबॉडी बनने ही नहीं दें व म्यूटेंट से संक्रमित रोगियों में बहुत कम या शून्य एंटीबॉडी होंगे।
गौरतलब है कि, जहां देश में रोजाना कोरोना के मामलें बड़ते जा रहें है वहीं शोधकर्ताओं के लिए वैक्सीन विकसित करने के सामने कई चुनौतियां जन्म लें रहीं हैं। जो अवश्य ही चिंता पूर्ण विषय हैं।
-निधि जैन

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