ओर भी तकलीफें हैं
बात होनी चाहिए किसानों की, बेरोजगारी की, बॉड़र सिक्योरिटी की, जीड़ीपी की अन्य कई ऐसे मुद्दों की जिनसे इस वक्त हमारे देशवासियों को जूझ ना पढ़ रहा है। लोगों के घर में खाने को अनाज नहीं है, साफ़-सफाई की कोई सुविधा नहीं है।
एक तरफ कोरोना का खोफ है लोगों के मन में, वायरस संक्रमितों के आकड़े प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं पर फिर भी बात हो रहीं है दीपिका की, कंगना की, रिया की। माना बेशक़ यह अहम मुद्दा है सुंशात की मौत का उससे जुड़े ड्रगस कनेक्शन का जिसमें बढ़ें-बढ़ें सिलेब्रिटीज़ के तार जुड़े हुए हैं पर हम यह कैसे भूल सकते हैं यह पहली बार हुआ है जब संसद में कोई बिल पास हुआ और उसके अगले दिन सरकार को उस बिल के लिए सफाई देनी पड़ी। सरकार द्वारा अखबारों में इश्तिहार छपे अपनी बात को सही साबित करने के लिए कि यह बिल अमीरों के लिए नहीं गरीबों, किसान के हक में है। बहरहाल, हाल ही में लोकसभा में पास हुए तीन किसान बिल में से दो बिल को तो राज्यसभा से भी मंजूरी मिल गई है। जो राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून का रूप ले लेगा। राज्यसभा ने दो किसान बिल यानी फॉर्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड ऐंड कमर्श बिल 2020 और फॉर्मर्स अग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस ऐंड फार्म सर्विसेज बिल 2020 को मंजूरी दी है लेकिन इन किसान बिल का बड़े पैमाने पर विरोध किया जा रहा है व किसानों का विरोध जारी है। हालांकि खुद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि सरकारी खरीद और एमएसपी यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस जारी रहेगी।और इस कानून के कारण वह अपनी फसल को बाजार में भी अपनी सहूलियत और मुनाफे के हिसाब से बेच पाएंगे। इस कानून के कारण किसानों को आजादी होगी कि वह अपनी फसल को सीधा कोल्ड स्टोरेज, वेयर हाउस, प्रोसेसिंग प्लांट्स, होटल, रेस्टोरेंट में बेच सकें पर फिर भी इन सबके बावजूद कुछ किसान इसका विरोध कर रहे है तथा इस बिल का विरोध मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े किसान कर रहे हैं। पूरे देश के किसान इसका विरोध नहीं कर रहे हैं। इन किसानों को डर लगता है कि सरकार धीरे-धीरे एमएसपी और सरकारी खरीद की परंपरा खत्म कर देगी व इन राज्यों में बड़े-बड़े किसान हैं और सरकारी खरीद को लेकर इन्फ्रास्ट्रक्चर काफी मजबूत है। सरकार ने 23 फसलों के लिए एमएसपी का निर्धारण किया है। हालांकि वह फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया की मदद से केवल गेहूं और चावल की खरीद करती है।
पिछले कुछ समय से वह दलहन की भी खरीदारी कर रही है। ऐसे में किसानों को लगता है कि धीरे-धीरे ये खरीदारी भी बंद कर दी जाएगी। जो वास्तविक में नहीं होगा। सरकार ने जिन दो बिल को पास किया है, माना जा रहा है कि उससे छोटे और मध्यम वर्ग के किसानों को काफी फायदा पहुंचेगा और कमिशन फॉर ऐग्रिकल्चर कॉस्ट ऐंड प्राइसेस 2020-21 की एक रिपोर्ट के अनुसार भी सरकारी खरीद और एमएसपी सिस्टम का सबसे ज्यादा फायदा बड़े किसानों को हो रहा है। पिछले कुछ सालों में छोटे और मध्यमवर्गीय किसानों की स्थिति में भी सुधार आया है। नीति आयोग की 2015 की एक रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया था कि सरकार के लिए यह संभव नहीं है कि वह हर सीजन में बड़े पैमाने पर हर कमोडिटी की MSP पर खरीदारी करे व बड़े किसानों को इसी बात का डर लगता है। वैसे तो सरकार केवल गेहूं और चावल की एमएसपी पर खरीदारी करती है। दलहन और अन्य फसलों की खरीदारी ना के बराबर ही होती है।
यही वजह है कि पंजाब, हरियाणा के बड़े-बड़े किसान केवल गेहूं और चावल की ही खेती करते हैं। इसके चक्कर में दलहन और तिलहन का रकबा काफी घट गया है। पंजाब और हरियाणा में खेती में पानी का इतना उपयोग हो रहा है कि ग्राउंड वाटर का बहुत बुरा हाल हो गया है। यह किसान ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में ही केवल ये दो फसलें की ही खेती करते हैं। एमएसपी पॉलिसी के कारण फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के पास ओवर स्टॉक है। चावल और गेहूं गोदाम में सड़ रहे हैं, इसके बावजूद खरीदारी की जाती है।
दूसरी तरफ दाल का औसत कंजप्शन काफी घट गया है। 1960 के दशक में देश में प्रति व्यक्ति दाल की उपलब्धता और सेवन 25 किलोग्राम थी जो अब घटकर 13.6 किलोग्राम पर पहुंच गई है। गौरतलब है कि कहीं ऐसा ना हो जाए कि किसान अन्न उगाना ही बंद कर दे और फिर से जनता को वैश्विक महामारी कोरोना वायरस से भी भयंकर आपदा का सामना करना पड़े।
-निधि जैन