इतिहास में क्यूं दर्ज है इतने कत्ले-आम के किस्से?

 बंगाल में चुनाव ने दस्तक दे दी है और अब हर आम व खास को पता है कि यहां वोट की स्याही के साथ ही जमीन पर खून के छींटे भी गिरेंगी, जो गिरते भी आए हैं। दरअसल, देखा जाए तो यह हकीकत है कि बंगाल को खूनी सियासत विरासत में मिली है। 1959 के खाद्य आंदोलन से शुरू हुई यह सियासी हिंसा का दौर छह दशक बाद भी बदस्तूर जारी है परन्तु बदला है तो बस सत्ता परिवर्तन के साथ इसका स्वरूप और उद्देश्य। जो अब मूल रूप से निजी हो चुका है।

ऐतिहासिक खाद्य आंदोलन के दौरान 80 लोगों का कत्ल हुआ था, 1967 में नक्सलबाड़ी आंदोलन के समय सैकड़ों हत्याएं हुई थी,  70 के दशक में फारवर्ड ब्लॉक नेता हेमंत बसु व अजीत कुमार विश्वास की नृशंस हत्या, 1979 में मरीचझापी द्वीप नरसंहार, 1990 में तत्कालीन कांग्रेस नेत्री ममता बनर्जी पर कोलकाता की सड़क पर माकपा समर्थकों का जानलेवा हमला भी हुआ था, 1996 में ममता के नेतृत्व में राज्य सचिवालय राइटर्स अभियान के दौरान पुलिस फायरिंग में युवा कांग्रेस के 13 कार्यकर्ताओं की मौत, 2007 में नंदीग्राम में पुलिस फायरिंग में 14 लोगों की मौत। आलम तो यह है कि इतिहास के पन्नों पर न जाने ऐसे कितने काले अध्याय दर्ज हैं। जो सीधे अपना उल्लू सीधा करने के लिए किए गए है। वहीं बंगाल में सियासी संघर्ष व राजनीतिक हत्याओं की बहुत लंबी फेहरिस्त है।
उल्लेखनीय है कि नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ने अपने 2019 के आंकड़ों में बंगाल को सियासी हिंसा के मामलों में शीर्ष पर यूं ही नहीं बताया था। बेशक बंगाल में सत्ता पर बैठने वालों के चेहरे और पार्टी का झंडा तो बदला लेकिन सियासी रक्तचरित्र बिल्कुल भी नहीं बदला परन्तु सवाल ये है कि आखिर बंगाल में इतनी सियासी हिंसा की वजह है क्यां?
-निधि जैन

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