उसने खा लिया खाना सोच कर

 इंसान ने तो जैसे हैवानियत को भी शर्मसार करने की कसम खाई है। तभी तो उसने एक बेजुबान पर इस कदर कहर भरपाई है। जानवर का जीवन पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर करता है, परंतु इंसान प्रकृति को बर्बाद करने में लगा है। किसी शर्मनाक हरकत के लिए अक्सर कहां जाता है कि जानवर हो क्या? लेकिन केरल में जो हुआ उसके बाद तो यह कहावत बदलनी पड़ेगी।

जहां खाने की तलाश में मल्लापुरम जिले के शहर की ओर आई हथिनी को किसी ने अन्नास के भीतर पटाखे छुपा कर खिला दिए। जैसे ही उसने फल खाया, उसके मुंह के भीतर धमाके होने लगे। दर्द से झटपटाती हुई वह जंगल की ओर भाग चली। लेकिन यहां भी उसने इंसानियत नहीं छोड़ी। जंगल में जाते समय उसने किसी भी घर व मनुष्य को नुकसान नहीं पहुंचाया। व घायल होने के बाद भी वह चुपचाप तीन दिन तक वेलियार नदी में खड़ी रही। कोई भी चिकित्सा मदद नहीं पहुंचने के कारण उसने उस नदी में ही दम तोड़ दिया।
गौरतलब है कि, उसने तो इंसान को इंसानियत निभाने का मौका दिया था परंतु इंसान ने इंसानियत के बदले मौत का कहर दिया। उसने खाया तो था खाना सोचकर लेकिन इंसान ने खाने के बदले जहर दे दिया। और जब पोस्टमार्टम हुआ तो डॉक्टर भी खुद अपने आप को रोने से रोक नहीं पाए। जब उन्होंने देखा की हथिनी अकेली नहीं मरी है उसके पेट में पल रही एक नन्ही सी जान भी चली गई। किसी खुदगर्ज इंसान ने अपने खेल के लिए उस दिन तीन जानें ले ली। हथनी की, उसके बच्चे की और उस भरोसे की जो उस हथिनी ने हम इंसानों पर किया था। तीन दिन तक वह हथिनी पानी में खड़ी रही उसने किसी को भी अपने पास नहीं आने दिया। शायद वो जवाब चाह रही थी कि... कि हमें जानवर कहने वालों क्या तुम सच में इंसान हो?
इस घटना ने एक बार फिर इंसानियत को शर्मसार कर दिया। ना जाने इंसानियत कहां चली गई इंसानों के अंदर से। इंसान बदलेगा शायद इस उम्मीद में वह इस हैवानियत से भरी दुनिया को छोड़ कर दूसरे जहां चली गई। पर अच्छा हुआ कि उसने अपने बच्चे को जन्म नहीं दिया था। नहीं तो हम क्या कहते उससे कि, उसकी मां कहां चली गई हैं। मर चुकी है, इंसानियत इंसानों के अंदर यह एक बार फिर साबित कर दिया इंसान ने एक बेजुबान को मार कर। बस देखने वालों की नजर में अंतर है, वरना जानवर तो आज के इंसान से कहीं बेहतर है। और जानवर तो बेवजह ही बदनाम है इस स्वार्थी दुनिया में वास्तविक में तो इंसान से ज्यादा खूंखार कोई नहीं हैं।
-निधि जैन

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