अच्छी नहीं दोस्ती प्लास्टिक के साथ

अब तो इंसानों का हठ प्रकृति के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। इंसान इतने जिद्दी हो चुके हैं कि वो लाख मना करने पर भी प्रदूषण फैलाने से बाज़ नहीं आ रहें और इसी का नतीजा यह हुआ है कि अब प्रदूषण ऐसी जगह तक पहुंच गया है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इस वक्त पृथ्वी पर प्लास्टिक का कचरा सबसे बड़ी समस्या बन चुका है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक़ वैज्ञानिकों ने गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के गर्भ में माइक्रो प्लास्टिक की पहचान की है। माइक्रो प्लास्टिक 5 मिलीमीटर से भी कम आकार के प्लास्टिक या फाइबर के छोटे छोटे टुकड़े होते हैं। गौरतलब है कि जो प्लास्टिक अब तक समुद्र, हवा, पानी और खाने में मिलती थी, वो अब मां के गर्भ तक पहुंच चुकी है। जो अवश्य ही चिंता पूर्ण विषय है। इस रिसर्च में कुल 6 महिलाओं को शामिल किया गया था। जिनमें से चार महिलाओं की गर्भनाल में नीले, लाल और गुलाबी रंग के प्लास्टिक के कण मिले हैं। गर्भनाल महिलाओं के शरीर का वह अंग होता है, जिससे गर्भावस्था के दौरान बच्चे को ऑक्सीजन और ज़रूरी पोषण मिलते है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि पेंट्स, कॉस्मेटिक और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स के ज़रिए प्लास्टिक के यह कण महिलाओं की गर्भनाल तक पहुंचे हैं। अजन्मे बच्चे के लिए मां के गर्भ से सुरक्षित जगह कोई नहीं हो सकती, लेकिन अब इसमें भी माइक्रोप्लास्टिक मिलने से वैज्ञानिकों की चुनौती बढ़ गई है। बढ़ते प्लास्टिक के उपयोग के कारण यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अगले 20 वर्षों में दुनिया प्लास्टिक की गंभीर समस्या से जूझ रही होगी। हर वर्ष पूरी दुनिया में 30 करोड़ टन प्‍लास्टिक का कचरा पैदा होता है। जो कि पूरी दुनिया की जनसंख्या के कुल वज़न के बराबर है।
बहरहाल आज हमारे देश में प्लास्टिक बैग्स पर बैन है, लेकिन बावजूद इसके लोग इसका प्रयोग करते हैं क्योंकि हम प्लास्टिक फ्रेंडली हो गए हैं। एक इंसान के शरीर में पूरे साल में 39 हज़ार से 52 हज़ार प्लास्टिक के कण प्रवेश करते हैं और सांस लेते हुए 74 हज़ार प्लास्टिक के कण शरीर में चले जाते हैं जिसका स्पष्ट मतलब है कि आज समुद्र, हवा, पानी और यहां तक की हमारे शरीर में भी प्लास्टिक की मिलावट हो चुकी है।
हॉन्ग कॉन्ग की एक पर्यावरण संरक्षण संस्था ने एक रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वर्ष दुनियाभर में लगभग 5200 करोड़ मास्क बनाए गए हैं व अनुमान है कि इसका 3 प्रतिशत यानी 150 करोड़ मास्क समुद्र में पहुंच जाएंगे एंव यह मास्क एक ख़ास किस्म के प्लास्टिक से बने होते हैं और प्रत्येक मास्क का वज़न तीन से चार ग्राम है। इस हिसाब से समुद्र में जो 150 करोड़ मास्क फेंके जाएंगे, उनका वज़न 68 लाख किलोग्राम होगा, जिसे नष्ट होने में लगभग 450 साल लग जाएंगे। उल्लेखनीय है कि जिस मास्क को कोरोना वायरस से बचाव के लिए सबसे बड़ा हथियार माना जा रहा है, उससे ही समुद्र में प्लास्टिक प्रदूषण बढ़ जाएगा। जो बेशक़ ही गंभीर हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने इस ख़तरे से बचने के लिए कपड़े से बने मास्क पहनने का सुझाव दिया है। पहले दुनिया भर में प्लास्टिक के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया और हर चीज़ में प्लास्टिक का इस्तेमाल होने लगा व जब कोरोना वायरस आया तो इससे बचने के लिए जो मास्क बनाए गए, उनमें भी प्लास्टिक का उपयोग किया गया।
दुनिया के कई देश जब समुद्र में प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, ऐसे में मास्क से पैदा हुए इस नए संकट ने सबकी चिंता बढ़ा दी है। नए साल में इस संकट का सामना करना दुनियाभर के देशों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। इंसानों ने कोरोना की वैक्सीन तो बना ली, लेकिन क्या प्लास्टिक के प्रदूषण के खिलाफ कोई वैक्सीन नहीं बनाई जा सकी?
-निधि जैन

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