11 मृतक किसानों का जिम्मेदार कौन?
इस वक्त एक सवाल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर बीजेपी के बड़े-बड़े नेता जूझ रहे हैं। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद भी केंद्र सरकार किसान संगठनों के रुख़ में बदलाव नहीं ला पा रही है।
भारत लोकतांत्रिक देश है। जहां पर हर किसी को अपनी बात कहने का हक है, परन्तु तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे किसी और को तकलीफ ना हो। कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर दिल्ली को बीते कुछ दिनों से जिस तरह बंधक बनाया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। वह भी तब जब इन कृषि कानूनों से दिल्ली की जनता को कई न कई फायदा मिलने वाला है। दिल्ली में इन दिनों प्याज 60 रुपये किलो बिक रहा है, जबकि गांव देहात में किसान पांच रुपये किलो प्याज बेचने को मजबूर हैं। बहरहाल नया कानून किसानों को यह अधिकार देता है कि वो प्याज किसी भी मंडी में जाकर बेच सकते हैं और अभी तक किसानों की मजबूरी यह थी कि वे मंडियों में आढ़तियों को ही कृषि उत्पाद बेचते थे लेकिन अब वह खुद फसल बेचने में सक्षम होंगे। यहां तक कि वह दिल्ली आकर अपना उत्पाद बेच सकते हैं जिससे किसान और दिल्ली की जनता दोनों को लाभ होगा परन्तु अब अवश्य ही आंदोलन में किसानों के नाम पर सिर्फ राजनीति हो रही है। जो देश के लिए बहुत खतरनाक स्थिति है।दिल्ली के लोग इसके पहले सीएए, एनआरसी के दौरान भी बंधक बनाए गए थे। हालांकि उस समय तो दिल्ली के एक हिस्से में सड़क बंद की गई थी लेकिन इस बार तो प्रमुख हाइवे को ही बंद कर दिया गया है। जिससे लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है। बाजारों में खरीदार घट गए हैं। दिल्ली जाम से जूझ रही है परन्तु कोई भी प्रदर्शन के नाम पर ऐसे दिल्ली को बंधक नहीं बना सकता। दिल्ली रोजगार का केंद्र है। जहां पूरे देश के लोग आकर रोजगार करते हैं। दिल्ली के प्रमुख मार्गों को बंद करना किसी भी रूप से जायज नहीं हैं। हालांकि शाहीन बाग प्रदर्शन की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी सड़क बंद कर प्रदर्शन करने को लेकर सख्त टिप्पणी करी थी। गौरतलब है कि प्रदर्शन में आए लोग बीएमडब्ल्यू, आडी समेत महंगी गाड़ियों से आए हैं।
तो क्या वास्तविक में यह किसान हैं या नहीं? हकीकत में तो यह वह लोग हैं जो किसानों की फसल औने-पौने दामों में खरीदकर उसे महंगे दामों में बेचकर उसका फायदा उठाते हैं, जबकि किसानो की हालत तो जस की तस बनी हुई है एंव अगर हम किसानों के मांग पत्र की बात करे तो उसमें एक मांग है कि किसानों को पूर्व की भांति पराली जलाने दिया जाए तथा वर्तमान में पराली जलाने पर प्रतिबंध है। अब यह दिल्ली का हर शख्स जानता है कि पराली जलाने पर क्यों पाबंदी लगाई गई है। दिल्ली में डेढ़ करोड़ आबादी प्रदूषण की मार झेल रही है और प्रदूषण में पराली का बड़ा योगदान है व जब किसान पराली जलाए जाने की मांग कर रहे हैं तो वह दिल्ली के साथ कितना न्याय कर रहे हैं? दिल्ली के लोगों का कितना ध्यान रख रहे हैं? चाहें प्रदर्शन कोई भी हो नियम कायदे में ही होने चाहिए ताकि उससे किसी अन्य को कोई नुकसान या तकलीफ ना पहुंचे और सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रदर्शन के नाम पर अधिकारों का गलत इस्तेमाल ना हो। दिल्ली देश की राजधानी है, जहां रोजमर्रा के काम काज ठप होने से राजस्व को बड़ा नुकसान होता है व कोरोना काल में वैसे ही उद्योग धंधे मुश्किल दौर में हैं एंव अब प्रदर्शन के चलते हालत और खस्ता होती जा रही है। दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन को 15 दिनों से ज्यादा हो चुके हैं। 4 दिसंबर को किसान संगठनों ने भारत बंद का आह्वान भी किया था। जिसके बाद अब एक बार फिर बीते दिन कृषि कानूनों के विरोध में राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन करने का ऐलान किया था।चिंताजनक बात यह है कि दिल्ली में पड़ रही कड़ाके की ठंड में किसानों द्वारा सड़कों पर बैठकर धरना प्रदर्शन किया जा रहा है। जिसमें युवा और अधेड़ उम्र में किसान शामिल हैं। सर्दी के मौसम के कारण कई किसानों की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। जिसके चलते किसान बीमार हो रहे हैं। यहां तक कि बीते दो हफ्तों में 11 किसानों ने दम भी तोड़ दिया है।
किसान आंदोलन के दौरान मरने वाले ज्यादातर किसान पंजाब से ही ताल्लुक रखते हैं परन्तु 17 दिनों से चल रहे किसान आंदोलन में सरकार और किसानों की बातचीत में कोई समाधान की उम्मीद नहीं दिख रही हैं। सर्दी के मौसम में खुले आसमान के तले बैठकर किसान बीमार पड़ रहे हैं और अब तो यह ही लग रहा है धरने पर मौतों का यह सिलसिला जल्द ही रुकने वाला नहीं है लेकिन किसानों की जिंदगी के खातिर यह जरूरी है कि किसान नेता और सरकार दोनों ही जल्द से जल्द इस गतिरोध से निकलकर समाधान की तरफ बढ़े।
-निधि जैन