सब बर्दाश्त कर, मरते हुए इंसान के लिए खड़े हो जाइए।

 


रोजाना कोरोना संक्रमण के बढ़ते आकड़े देख कर बस यही विचार आता है, जिससे जितनी सहायता हो सकें वह उतनी करें क्योंकि जैसे छोटे-छोटे सुख बड़े होते हैं, ठीक उसी तरह छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े होते है। वाट्सएप पर काढ़े का फार्मूला, खान पान की नसीहत और सही-गलत फोन नंबर फारवर्ड करने का वक्त अब जा चुका है। वैसे भी पिछले एक वर्ष में आयुर्वेद से अधिक काढ़े वाट्सएप ने तैयार कर दिए हैं। संसाधनों की कमी का रोना रोने का समय भी गया। इसलिए आपस के मन मोटाव को परे रखकर इन सब बातों से बाहर आकर हमें तन, मन और धन से ज़रूरतमंदों की सहायता करनी है। ऑक्सीजन और बेड के जुगाड़ में सरकारों और उनके अफसर पहले ही जूझ रहे है लेकिन हमें आपदा में अवसर को भूल आपदा को औजार बना लेने की सफल कोशिश करनी है। ताली और थाली बजाने के बजाय इस समय पड़ोसी के साथ खड़े होने का वक्त है। बहरहाल किसी के काम आने के लिए लखपति होना आवश्यक नहीं है प्रतेक व्यक्ति के पास इतनी ज़मा पूंजी तो होती ही है कि संकट के समय वह कुछ दिन बांटकर खा सकें। एक ब्रांडेड टी शर्ट की कीमत से कम खर्च में भी औसत रसोई चल जाती है। उल्लेखनीय है कि इस समय इंसानियत उन्हीं से सांस ले रही है जो दूसरों के लिए आगे आ रहे हैं। सहायता कीजिए उन लोगों की जो आक्सीजन सिलिंडर खरीदकर मरीजों तक पहुंचा रहे हैं, जो घर-घर खाना पहुंचाने जा रहे, जो सीमित संसाधनों में भी सेवा का कोई अवसर नहीं छोड़ रहे। बेशक़ यह लड़ाई लंबी और महीनों चलने वाली है परन्तु सबके सहयोग से ही जीती जा सकेगी। जिस देश की हवा-पानी पर हम-आप जीवित है, उसका कर्जा उतारने का यही वक्त है। मोबाइल फोन से बाहर आकर शरीर से सेवा का यही समय है। सेवा का निमंत्रण नहीं आता इसलिए स्वयं लोगों की मदद कीजिए। गौरतलब है कि रात को सोते समय यह जरूर सोचिए कि आपने पूरे दिन में किसकी सहायता की, उससे पहले शनिवार को किसकी मदद की और सोमवार को किसकी करने वाले हैं। किसे दवा पहुंचाई, किसे खाना दिया, किसके दरवाजे पर जाकर सब्जी रख आए और घर में अकेले पड़े किस वृद्ध को दूध का एक पैकेट देने गए आप। इन सब सवालों के उत्तर मिलने पर स्वयं की अंतरात्मा में झांककर संतुष्टि की मीठी नींद के हवाले अवश्य ही प्रसन्नता मिलेंगी।

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