बेटियों की बलि कब तक ली जाती रहेगी ?

देवी की पूजा का ढोंग छोड़ देना चाहिए यकीनन इस देश के लोगों को क्योकि देवी के रूप में जन्मी अपनी बेटी ही सुरक्षित नहीं है इस दुनिया में तो देवी माँ की पूजा करके क्या हासिल होगा।
गौरतलब है कि 16 दिसंबर 2012 की उस रात को यूपी के हाथरस में फिर से दोहराया गया है, 2012 में भी निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा के लिए पूरा देश सड़क पर आ गया था और अब भी अपने घर की महिलाओं की रक्षा के लिए लोग सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हो गए हैं।
रेप किया, रीढ़ की हड्डी तोड़ दी, जीभ काट दी, दुपट्टे से गला घोट दिया इसको पढ़ने में ही डर लग रहा हैं तो ऐसे में उस गुड़िया पर क्या बीती होगी उसे तो हम और आप सोच भी नहीं सकते। जब जानवार उसके साथ हैवानियत को अनजाम दे रहें होगे उस दृश्य को तो सोचकर भी रोमटे खड़े हो जाते हैं। वैसे अब हमें यह मान लेना चाहिए कि हमसे अच्छे तो हिजड़े हैं जो किसी लड़की के साथ रेप, बलात्कार जैसी दर्दनाक, शर्मनामक, कायराना हरकत तो नहीं कर सकते। हालांकि यूपी के हाथरस में दलित युवती के साथ हुई गैंगरेप की घटना में चारों आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए हैं। कई दिनों से पीड़िता वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत के बीच अपनी जिंदगी से जंग लड़ रही है लेकिन बीते दिनों उसने भी दम तोड़ दिया। वहीं परिजनों का आरोप है कि गांव में ऊंची जाति के लोगों ने उन्नाव कांड जैसा हश्र करके उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी है। पीड़िता के परिजनों का कहना है कि गांव में ठाकुर जाति के दबंग लोगों ने उन्नाव जैसी जघन्य घटना को दोहराने की बात करते हुए जान से मारने की धमकी देकर पीड़िता के परिवार वालों की आवाज को दबाने की कोशिश की है। वैसे पीड़ित परिजनों की शिकायत पर गांव के अंदर पीएसी तैनात कर दी गई है। पीड़िता के पिता ने कहना है कि बिटिया की रीढ़ की हड्डी टूट गई है जिससे उसके शरीर के आधे हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था।
बहरहाल मामले में मायावती ने भी सुरक्षा-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। मायावती का कहना है कि यूपी सरकार की अनन्त घोषणाओं व निर्देशों के बावजूद दलितों और महिलाओं पर अन्याय-अत्याचार, बलात्कार, हत्या की घटनायें नहीं रूक रही हैं तो इससे सरकार की नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक है। खासकर छात्राओं का घर से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है तो ऐसी कानून-व्यवस्था किस काम की हैं।
उल्लेखनीय है कि यूपी के जिला हाथरस में एक दलित लड़की को पहले बुरी तरह से पीटा गया, फिर उसके साथ गैंगरेप किया गया, जो अति-शर्मनाक व अति-निन्दनीय है जबकि अन्य समाज की बहन-बेटियां भी अब यहां प्रदेश में सुरक्षित नहीं हैं। जिस पर सरकार को जरूर ध्यान देना चाहिए।
गौरतलब है कि यूपी के हाथरस के थाना चंदपा इलाके के गांव में 14 सितंबर को एक 19 साल की दलित युवती के साथ गांव के रहने वाले ही चार दबंग युवकों ने गैंगरेप किया। जो किसी हैवानियत से कम नहीं है व रेप के बाद उसकी जीभ भी काट दी गई थी। वारदात के बाद पीड़िता के घर वालों ने उसे अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया एंव घटना के तीन आरोपी पहले ही गिरफ्तार हो चुके थे जबकि चौथे आरोपी को शनिवार शाम गिरफ्तार किया गया।
आरोपियों की पहचान गांव के ही रहने वाले संदीप, लवकुश, रामू और रवि के रूप में हुई थी। हाथरस पुलिस अधीक्षक ने बताया कि संदीप को 14 सितंबर को ही गिरफ्तार कर लिया गया था। घटना के कई दिन बीत जाने के बाद पुलिस ने रामू और लवकुश को गिरफ्तार किया। वहीं फरार चल रहे चौथे आरोपी रवि को 26 सितंबर को पुलिस ने गिरफ्तार करते हुए जेल भेज दिया गया है। तथा बाजरे के खेत में गैंगरेप किया था व इस पूरे मामले में पुलिस ने लापरवाही भरा रवैया अपनाया। रेप की धाराओं में केस ना दर्ज करते हुए छेड़खानी के आरोप में एक युवक को हिरासत में लिया। इसके बाद उसके खिलाफ धारा 307 यानी हत्या की कोशिश में मुकदमा दर्ज किया गया था। घटना के नौ दिन बीत जाने के बाद पीड़िता होश में आई तो उसने अपने साथ हुई आपबीती अपने परिजनों को बताई। जब पीड़िता का डॉक्टरी परीक्षण हुआ तो इसमें गैंगरेप की पुष्टि होने के बाद हाथरस पुलिस ने तीन युवकों को गिरफ्तार किया एंव बाद में चौथा आरोपी भी गिरफ्तार कर लिया गया। परन्तु दो हफ्ते पहले गैंगरेप का शिकार हुई महिला ने दिल्ली के अस्पताल में दम तोड़ा व इस मामले में उत्तरप्रदेश की राज्यपाल को वैसे ही संज्ञान लेना चाहिए जैसे महाराष्ट्र के राज्यपाल ने डायरेक्टर अनुराग कश्यप पर आरोप लगाने वाली लड़की के मामले में लिया है।
और वैसे अगर किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति के ख़िलाफ़ कोई अपराध होता है तो उसके लिए अभियुक्त पर एक अलग क़ानून लगता है व अगर किसी अनुसूचित जाति की लड़की के साथ रेप हो तो यह क्यों ना बताया जाए कि वो दलित है। अगर उसकी जाति के मायने ना होते तो फिर क्यों यह क़ानून लगता हैं एंव सामाजिक ताना-बाना भी कई बार इस तरह की घटनाओं के कारक बनते हैं। मज़लूम पर जोर आजमाइश अक्सर कथित कुलीनों को अपना जन्मसिद्ध अधिकार लगता है। जो बेशक़ निंदनीय हैं।
गौरतलब है कि कोई समाज कितना सभ्य और सुसंस्कृत है इसका अंदाज़ा कमजोरों के प्रति व्यवहार से यकीनन आंका जाता है और हाथरस की कमजोरी साफ नजर आ रही हैं। जैसे निर्भया के लिए आवाज़ उठाना ज़रूरी थी, इसके लिए भी है। इंडिया और हिंदुस्तान का फ़र्क़ मिटा ना होगा। यह यकीनन अक्षम्य अपराध है, सरकारों को बताना पड़ेगा। कोई अपराधी यह ना सोचे कि जाति, धर्म, पार्टी या चुनाव के कारण बच निकलेगा। अपराधियों को जल्द से जल्द सजा मिलनी चाहिए। वैसे इस देश में बंद करना चाहिए वूमेंस डे बनाना, डॉटर डे मनाने का ड्रामा क्योंकि सबसे पहले इस समाज को सिर्फ बेटियों के रहने लायक तो बनाले हम।
वैसे कंगना को y श्रेणी की सुरक्षा दी गई पर हाथरस की बेटी को क्या दिया? क्या इस समाज में लड़की को मरना पड़ेगा तब जाकर सिस्टम की नींद टूटेगी। पुलिस परिवार के आरोप ख़ारिज करके कहेंगे कि नहीं गैंगरेप नहीं हुआ। कोई क्रूरता-बर्बरता नहीं हुई लेकिन जान फिर भी चली गई। ऐसे कैसे? कहाँ गए वो लोग जिनको हैदराबाद पुलिस के एंकाउंटर पर एतराज़ था ? काश गुड़िया को भी ऐसे ही इंसाफ़ उसी समय मिल गया होता तो उसकी आत्मा को शांति मिलती। अब तो बस यह ही कयास है कि इस मामले की फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई हो ताकि गुड़िया को निर्भया की तरह सात साल का लंबा इंतज़ार न करना पड़े।
हाथरस में दरिंदों ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं लेकिन निर्भयाकांड के दस साल बाद भी हम पीड़ितों के लिए मुआवज़े के एलान और सियासी बयानबाज़ी से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। ना तो दरिंदों का चरित्र बदला और ना ही क़ानून के रखवालों का। अब तो सवाल यह ही हैं कि इस देश में बेटियों की बलि कब तक ली जाती रहेगी ?
-निधि जैन

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