कुछ पल की खुशी!

- निधि जैन

जीने की ख़्वाहिश में हम हर रोज़ मरते हैं, पता है वो आये न आये लेकिन इंतज़ार आज भी करते है,, आखिर करें तो क्या करें एक तरफा मोहब्बत में है ही इतनी ताकत कि बेशक़ रिशते टूट जाते है लेकिन कभी ख्तम नहीं होते, इज़हार–ए–मोहब्बत के बाद से अब तक तेरी मोहब्बत का इंतजार हैं लेकिन ड़र है कि कहीं इसी इंतज़ार में ज़िन्दगी तमाम न हो जायें.
Looks जिंदगी में Matter करते है ये बात मैं अब तक समझ चुकी हूं लेकिन इतने भी करते है कि लोग उसके सामने सीरत को भूल जाए, ये मुझे उस दिन समझ आया. आज मैं आपको एक ऐसी कहानी सुनाती हूं जो चाहती तो हो सकती थी मुकम्मल पर चाह के भी हो न पाई...हैर अब वक्त तो वापस आ नहीं सकता लेकिन बीते हुए वो पल तो याद किए जा सकते हैं न...तो ये कहानी है साल 2015 की, ज्यादा पुरानी नहीं है...असल में ये कहानी नहीं है, मेरी जिंदगी के वो पल है या यूं कहूं कि अभी तक के मेरी जिंदगी के सबसे सबक वाले दिन थे वो...जिन्हें मैं भूल कर भी भूलना नहीं चाहती. तो चलिए शुरू करती हूं, मैं अपनी वो कहानी जिसने मुझे बहुत कुछ सिखाया, जिन्दगी जीने का एक अलग मायना दिया... तो ये भूले न भूलाइ कहानी गर्मियों के दिनों में शुरू हुई थी और तभी खत्म हो गई थी. अब आप सोच रहे होंगे ऐसी क्या कहानी है जो उसी समय शुरू हुई और तभी खत्म हो गई... तो जरा रुकिये जनाब, पहले पूरी कहानी सुन तो लीजिए.
मुझे आज भी याद है वो 6 जनवरी का दिन था, जिस दिन के बाद मेरी बेरंग जिंदगी में एक नया ख्वाब सज गया था... उस दिन भी रोजाना की तरह ही मैं घर से कॉलेज जाने के लिए निकली, लेकिन उस दिन मन बेचैन हो रहा था...कुछ अजीब सा लग रहा था जैसे कुछ होने वाला था.
और उस दिन वहीं हुआ मुझे ऐसी खुशी मिली या वो पल मिला जिसे मैंने कभी सोचा ही नहीं था. क्योंकि मैं ठहरी थोड़ी काली सी, मोटी सी, गवारन सी, कन्फ्यूज सी रहने वाली, अपनी ही प्रोब्लम में उलझी रहने वाली लड़की जिसे दूसरे की तो love स्टोरी सुनने मे बहुत मजा आता था, लेकिन अपने गमों के पिटारो को न तो सुनाने में दिलचस्पी थी और न ही अपना दुःख बाटने में. जो सोचती तो बहुत कुछ थी लेकिन कह नी पाती थी... शायद उस समय लोग नहीं थे मेरे पास उस समय क्या अब भी नहीं है, खैर यह सब तो वक्त वक्त की बात है,
चलिए ये सब छोङिये, कहानी पर वापस आते है... ठीक 10 बजे तक मैं कॉलेज पहुंची, कॉलेज के गोट पर एन्ट्री करी और अपनी क्लास में चली गई... मुझे आज भी याद है उस दिन मैं थोड़ी जल्दी पहुंच गई थी. तब तक क्लास शुरू नहीं हुई थी. मैं क्लास मे गई और अपनी जगह पर जाके बैठ गई. मैं न किसी से फालतू बात नहीं करती थी सिर्फ अपने काम से मतलब रखती थी तो मैं चुपचाप जाकर अपनी ड़ेस्क पर बैठ गई और अपनी कॉपी निकाल कर पड़ने लगी... मैं पढ़ ही रही थी कि मेरे फोन में एक मैसेज आया...मैंने अपने बैग से फोन निकाला और फोन का लॉक खोला तो देखा कि उसमें एक मैसेज आया मेरी सीनियर का, जिसमे लिखा हुआ था कि निधि जब फ्री हो तो मुझसे आकर कैंटीन में मिलना... उस समय मैंने उस मेसेज पर इतना ध्यान नहीं दिया और उसको मैसेज करा ठीक है. अभी तो क्लास है 1 घंटे बाद आकर मिलती हूं... तभी उसका रिप्लाई आया ओके.
इतने में सर भी क्लास में आ गए और क्लास शुरू हो गई. देखते ही देखते एक घंटा kaisa बीत गया pta he nhi chala और क्लास भी खत्म हो गई. फिर दूसरी क्लास शुरू होने में 5 मिनट थे तो मैंने सोचा जाकर उससे मिल लेती हूं... तो मैं कैंटीन में पहुंची मैंने आसपास देखा तो वह मुझे कहीं नहीं दिखी, इतने में मैं उसे फोन मिला ही रही थी कि वो मेरे सामने आकर खड़ी हो गई, हमारी बातचीत शुरू ही हुई कि उसने हंसते हुए कहा निधि एक लड़का है.
जिसने तेरा नंबर मांगा है... मैंने कहा क्या नंबर और वो भी मेरा? उसने कहा चौक क्यों रहीं हैं नंबर ही तो मांग रहा है. मैने उसे तो नहीं कहा पर मैं मन में सोच रही थी क्या मेरा नंबर. उस समय मन में एक खुशी भी थी और अजीब सा ड़र भी लग रहा था... अब आप सोच रहे होंगे नंबर ही तो मांगा है क्या कौन सा हाथ मांग लिया शादी के लिए...तो आपको बता दूं कि एक सीधी सादी लड़की जो अपने मन में कई हजारों सपनें बुन के बैठी थी,
जिसने कभी सोचा भी नहीं था कि कभी कोई लड़का उसे भी Aproach कर सकता हैं, कि कोई उसके भी ख्वाब देखता है... उसके लिए तो ये किसी ख्वाब से कम नहीं हैं... मैं इतने में न जाने और कितने समने बुन लेती कि मेरी दोस्त ने मुझे आवाज़ लगाई और कहा अरे वांह तू तो अभी से उसके सपने देखने  लगी, मैंने कहा नहीं नहीं ऐसा कुछ नहीं है, फिर उसने मुझे उसकी फोटो दिखाई. मैने कहां अच्छा ये इसे तो मैंने कई बार बस में देखा है पर कभी ऐसा नहीं सोचा कि कोई मुझे भी देखता होगा क्योंकि... भई हम तो अपने में रहने वाले थे अपने ही सपनों में खुश.... कभी सोचा ही नहीं इस बारे में, हमेशा से बस एक ही ख्वाब है कि लाइफ़ में कुछ हासिल करना है... अपने माँ-पापा का नाम रौशन करना है.... इन सब चकरो में कभी पड़ी ही नहीं थी और न कभी सोचा था कि ऐसा कुछ होगा. खैर कहते है न जो होता है अच्छे के लिए होता है तो शायद इसमें भी कुछ अच्छाई ही छुपी होगी हालांकि वो बात अलग है कि अब तक मुझे ये समझ नहीं आया कि ये हुआ क्या था. तो चलिए कहानी में आगे बढ़ते है उसने कहां मैने उसे तेरा नंबर दे दिया है अगर call या msg आए तो बात कर लियो और ये कहकर वो वहां से चली गई, इतने में ही next period की बैल बच गई और मैं जल्दी से अपनी क्लास में चली गई.... लेकिन पता नहीं उस दिन पहली बार
कैंटीन से क्लास तक के रस्ते में मैंने न जाने कितने ख्वाब बुन लिए थे.... जिन्हें मैं चाहती थी सच हो जिन्हें मैं चाहती थी कि मुकम्मल हो.... पर कहते है न कि अगर हर ख्वाब सच हो जाए तो ख्वाब और जिन्दगी में क्या फर्क रह जाएगा. जो देखा जाए तो सच भी है, तो यह मेरी जिंदगी का वहीं ख्वाब था जो चाहता तो सच हो सकता था लेकिन ख्वाब ही रह गया. हजारों ख्वाब के पूरे होनी की ख्वाहिश में मैं क्लास में पहुंच गई, पूरा दिन यही सोचने में निकल गया कि क्या होगा अब आगे और वैसे भी उस समय खोने के लिए कुछ नहीं था मेरे पास लेकिन पाने के लिए पूरा आसमान बाकी था.... और बस यही सोचते-सोचते मैं घर पहुंच गई. दिल bekarar हो रहा था उससे guftgu करने के लिए, बार-बार फोन check कर रहीं थी कि कोई msg या call तो नहीं आया लेकिन जितना मैंने अपनी कहानी को, अपनी आने वाली जिंदगी को imagine कर लिया था ऐसा असल में कुछ नहीं हुआ. दिल जिद्द कर रहा था उससे बात करने की परंतु जिद्द इतनी सी ही थी कि बात की शुरुआत वो करें.... अगले दिन के लिए मैंने बहुत सुंदर से कपड़े निकालें जो किसी स्पेशल दिन के लिए अलग रखे थे लेकिन उन्हें कल पहनने का decide किया. यही सोच रही थी कि क्या पता कल वो मिल जाए... अगला दिन शुरू होने में कम से कम 12 या 13 घंटे बचे थे लेकिन उस 12 से 13 घंटे में मैंने आप से तुम का सफर तय कर लिया था, उन ख्यालों में मैंने अपने कभी न पूरे होने वाले ख्वाब में अपने आने वाले रिश्ते को बुन लिया था, तू और मैं नहीं हम सिर्फ हम होंगे व बराबर का होगा हमारा रिश्ता यह सब सोच लिया था, उस समय सही में इतनी खुशी थी कि पलके भी नम थी. उस वक्त मुझे पता नहीं था कि इस रिश्ते का क्या अंजाम होगा लेकिन उस समय उन ख्वाब में मैं खुश थी और उस समय वो मेरे लिए काफी था. न जाने न पहचाने मुझे उससे कहना था कि इश्क हो गया है मुझे तुमसे, बेइंतेहा सा हो गया है तुमसे, कि मेरे सपनों में भी आने लगे हो तुम, रातों की नींद भी चुराने लगे हो तुम,, सोचती हूं कि अब कब कल होगी और कहूंगी तुमसे कि इस चोरी की सजा भी दे ही दूं तुम्हें.... जितनी खुश थी मैं उस दिन क्या पता था मुझे कि अगले दिन उतनी ही गम झेलने पड़ेंगे मुझे. खैर कहते हैं न हर एक इंसान को किसी न किसी चीज का bhoj, दुख अपने साथ लेकर चलना पढ़ता है, हर कोई अपनी जिंदगी में कुछ कमी लेकर आता है और वो हमारे ऊपर होता है कि हम उसे हंसकर अपना ले या रो कर उस गम को रोजाना जीते रहे. उन ख्वाबों में मैंने अपनी पूरी जिंदगी उसके साथ उन पल में जी ली थी... और इन ख्वाबों में ही सुबह हो गई, सुबह कॉलेज के लिए तैयार हुई और कॉलेज के लिए निकल पड़ी... बस स्टैंड पर पहुंची ही थी कि मेरी दोस्त मुझे वही खड़ी मिली हमारी बातें शुरू हुई और बातों बातों में उसने बड़ी आसानी से कह दिया की मुझ से गलती हो गई थी कि वो तेरी बात नहीं कर रहा था, वो तो सीरत की बात कर रहा था. सीरत वो लड़की है जो हमारे साथ ही बस में रोजाना आती जाती थी. उसने कहां मैंने जब उसे बताया न कि मैंने गलती से तूझे कह दिया, भाई मेरे ऊपर इतना गुस्सा कर रहा था कि तू पागल है क्या तूने उसे देखा है वो कहां और मै कहां, दिखने में तो अच्छी बिल्कुल भी नहीं लगती वो और ऊपर से मोटी और है... तूने सोच भी कैसे लिया कि मैं उसे पसंद करूंगा, उसने तो बहुत आराम से कह दिया था लेकिन उस समय मुझ पर क्या बीती थी वो तो मैं आपको कभी बया भी नही कर सकती, परन्तु उस मोड़ पर कह भी क्या सकती थी. हस लीजिए, हंसी तो बढ़ी आ रही होगी.... मुझे भी आ रही थी अपने ऊपर क्या सोचा था और क्या हुआ. यूं तो बड़ी आसानी से हो गई थी उससे मोहब्बत कि कुछ कहना चाहती थी उससे... उस समय आंखें नम हो गई थी पता था कि वह नहीं तो कोई और मिल ही जाएगा, जो नसीब में होगा लेकिन भगवान से कहना चाहती थी कि कोई और नहीं, कि कोई उससे अच्छा नहीं वो ही चहिए.... लेकिन ठीक है क्या कह सकते हैं जो होता है अच्छे के लिए होता है तो शायद क्या पता इसमें भी कुछ अच्छा छुपा हो कि हमारा मिलना मुकम्मल ही नहीं हुआ... वैसे आज भी दिल कहता है कि शायद कभी किसी मोड़ पर उससे मुलाक़ात हो जाए लेकिन दिमाग कहता है पागल है क्या... परन्तु अब भी जब भी उसकी याद आती है आंखें नम हो जाती हैं... बेशक उसके होने का एहसास लगा रहता है  चाहे हम साथ हो या नहीं.... लेकिन वो याद बहुत प्यारी थी जिसे मैं कभी भूलना नहीं चाहूंगी. खैर कहते हैं न कभी-कभी अपनी ही उम्मीदें रूला देती है और वो ही हुआ मेरे साथ,,

आख़िर में यही कहूंगी कि बेशक़ भुला दिया उसने मुझे ऐसे जैसे मैं कभी भुला ना पाई उसे.

((कहानी पूर्ण रूप से काल्पनिक है))

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वर्ष 2020 की यादें

अब कावासाकी से भी लड़ना है

चीन में कोरोना की वापसी