अब वैक्सीन पर हैकर्स की नजर
कोरोना वायरस से संक्रमण के मामले दुनियाभर में तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। दुनियाभर में अब तक कोरोना के 2.5 करोड़ से ज्यादा मामले दर्ज किए जा चुके हैं, और इस महामारी से पूरी दुनिया में आठ लाख से ज्यादा लोगों की मौत भी हो चुकी है और सिर्फ अकेले भारत में कोरोना से 70 हजार से ज्यादा लोगों अपनी जान गंवा चुके हैं।
तथा इस माहामारी से बचने के लिए भारत समेत दुनिया के कई देशों में कोरोना वैक्सीन बनाने का काम तेजी से चल रहा है व कई देशों में वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल जल्द पूरा होने की भी उम्मीद है लेकिन इस बीच अमेरिका ने दावा किया है कि, चीनी हैकर्स कोरोना वैक्सीन से जुड़े रिसर्च डेटा चुराने की कोशिश कर रहे हैं। जो बेहद ही शर्मनाक हरक़त है।बहरहाल, अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल और न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक भी अमेरिका की जांच एजेंसी फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन यानी एफबीआई और होमलैंड सिक्योरिटी विभाग ने चीन पर आरोप लगाया है कि, चीनी हैकर्स और जासूस कोरोना वायरस के लिए वैक्सीन से जुड़ी रिसर्च डेटा चुराने की कोशिश में लगे हुए हैं एंव साथ ही उन्होंने कहा कि अब वह चीनी हैकिंग को लेकर एक चेतावनी भी जारी करने पर विचार कर रहे हैं। वैसे दुनियाभर के वैज्ञानिक इस वक्त कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए वैक्सीन डिवेलप करने में लगे हैं और इस पूरी प्रक्रिया में देशों की घरेलू जासूसी एजेंसिया वैक्सीन से जुड़े डेटा की सुरक्षा कर रहीं हैं। उल्लेखनीय है कि देश में इस समय कोरोना की तीन वैक्सीन पर काम चल रहा है। जिसमें सीरम इंस्टीट्यूट का वैक्सीन ट्रायल के 2बी स्टेज और तीसरे स्टेज में पहुंच चुका है, वहीं भारत बायोटेक और जायड़स कैड़िला के वैक्सीन ने पहल चरण का परीक्षण पूरा कर लिया है। और भारत कोविड-19 की वैक्सीन को लेकर रूस से लगातार संपर्क में हैं ही व रूस ने भारत के साथ कुछ प्रारंभिक जानकारियां भी साझा की हैं। गौरतलब है कि, कोरोना संक्रमण को खत्म करने के लिए वैक्सीन ही एकमात्र रास्ता है इसलिए वैक्सीन की होड़ में कई देश हैं। एक ओर रूस ने एक के बाद दो वैक्सीन उतार दी है, वहीं अमेरिका भी आए-दिन जल्द से जल्द वैक्सीन लाने के दावे कर रहा है।
वैसे तो चीन भी इस मामले में पीछे नहीं है और खबरों के मुताबिक उसने अनौपचारिक तौर पर अपने सैनिकों और सरकारी लोगों को वैक्सीन देना भी शुरू कर दिया है लेकिन वैक्सीन फॉर्मूला चुराने के लिए हैकिंग का सहारा लेना बेहद ही शर्मनाक हरक़त है। बहरहाल, अगर चीन की बात करें तो वह देश पहले से ही कॉपी करने में बदनाम रहा है ऐसे में अगर चीन वैक्सीन के लिए हैकिंग कर रहा है तो यह कोई नई बात नहीं होगी। तथा फर्स्टपोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, पहले चीनी हैकर्स ने कोरोना वायरस के लिए फार्मा कंपनियों को हैक करने की कोशिश की, जो प्रयोग का ही हिस्सा थीं। और जब चीन का इससे काम नहीं बना तो हैकर सीधे उन यूनिवर्सिटी की डिजिटल सुरक्षा को तोड़ने में जुट गए, जहां वैक्सीन बन रही हैं। वैसे वैक्सीन का फॉर्मूला चुराने की फिराक में चीन अकेला नहीं। रूस तो इससे कहीं आगे जा निकला है। जुलाई में अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा की साइबर सिक्योरिटी फोर्स ने कहा था कि रूस का APT-29 समूह उनकी प्रयोगशालाओं से वैक्सीन का फॉर्मूला चुराने की कोशिश में है। एंव दूसरे देशों के हैकर्स जैसे चीन और नॉर्थ कोरिया के हैकर्स आर्थिक चोरी के लिए वैसे ही बदनाम हैं, जबकि रूस का यह समूह थिंक टैंकों से आइडिया की चोरी करता है। व साल 2014 में सबसे पहले अमेरिकी साइबर सिक्योरिटी फर्म क्राउडस्ट्राइक ने इस ग्रुप पर आरोप लगाया कि यह आइडिया की चोरी करता है।
और यह टारगेट पर वार करने के लिए अपने टूल्स और तरीके लगातार बदलता रहता है ताकि वो पकड़ में ना आ पाए। उल्लेखनीय है कि, 16 जुलाई को अमेरिका, कनाडा और यूके ने एक संयुक्त बयान जारी करके कहा था कि उन्हें शक है कि रूस वैक्सीन से जुड़ी अहम जानकारियां चुराने की कोशिश कर रहा है। और वो इसके लिए इसी ग्रुप की मदद ले रहा है। और उसके बाद फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन ने साफ करा था कि, हैकर्स वैक्सीन से जुड़े हेल्थ डाटा, इलाज और फॉर्मूला चुराने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि बयान से यह साफ नहीं हुआ था कि क्या डाटा को चुराया भी जा चुका है या नहीं और बयान में यह डर भी जताया गया था कि दूसरे देश भी यकीनन अब टारगेट हो सकते हैं। वैसे ईरान के हैकर्स भी कतार में हैं। डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना वायरस पर काम कर रहे ब्रिटिश इंस्टीट्यूट पर ईरान से साइबर अटैक भी किया जा चुका है। ब्रिटेन के नेशनल साइबर सिक्योरिटी सेंटर का कहना है कि, कोरोना से जुड़े एक्सपर्ट और इंस्टीट्यूट पर साइबर अटैक की घटनाएं बढ़ गई हैं।
सेंटर साइबर अटैक से लड़ने के लिए 24 घंटे काम कर रहे है। वैसे इसमें अमेरिका की हालत सबसे ज्यादा खराब है। क्योकि वहां मॉडर्ना फार्मा कंपनी वैक्सीन के ट्रायल में सबसे एडवांस स्टेज पर पहुंच चुकी है। और चर्चा है कि वह नवंबर में वैक्सीन ले आएगी। तो इसीलिए इस सबके बीच उसपर लगातार साइबर हमले हो रहे हैं। और यहीं कारण है कि अमेरिकी इंटेलिजेंस, जो आमतौर पर सैन्य मोर्चों पर रूसी खतरे को देखता रहता है, फिलहाल उसका सारा फोकस इसपर है कि कैसे वह रूस को वैक्सीन फॉर्मूला चुराने से रोक सके। हालांकि, चीन के हैकर इसपर दो तरीके से काम कर रहे हैं। पहले तरीके के तहत चीन ने ड़ब्लूएचओ में अपनी ताकत का उपयोग करते हुए वह सारी जानकारियां सबसे पहले पा ली होंगी, जो कोरोना वायरस की वैक्सीन बनाने में जरूरी हैं। व कम से कम फिलहाल तो यही माना जा रहा है कि इसके अलावा वो एडवांस स्टेज में जा चुके रिसर्च में सेंध लगाने की भी कोशिश कर रहा है ताकि खुफिया एजेंसी एफबीआई ने भी इस बारे में रिसर्च लैब्स को चेतावनी दी है। एंव एफबीआई के अनुसार, अमेरिका ने अपने यहां ह्यूस्टन के चीनी दूतावास को इसलिए ही बंद करवाया है क्योकि कथित तौर पर उस दूतावास के जरिए चीन के हैकर्स बायोमेडिकल रिसर्च को हैक कर रहे थे। परन्तु अब सवाल तो यह उठता है कि जब वैक्सीन आने ही वाली है तो इसे हैक करने की क्या जरूरत है? लेकिन इसका जवाब तो स्पष्ट है क्योकि कोरोना वायरस संक्रमण को सदी की सबसे बड़ी महामारी माना गया है।
ऐसे में जो भी देश सबसे पहले वैक्सीन लाने और उसे बाजार में लाने में कामयाब हो जाएगा, वह देश यकीनन ही आर्थिक के अलावा राजनैतिक तौर पर भी काफी अहम हो जाएगा। और इसकी एक और वजह यह भी है कि, कथित तौर पर चीन और रूस जैसे देश, शॉर्टकट खोज रहे हैं ताकि वह ज्यादा संसाधन लगाए बिना वो वैक्सीन को बना लें और उनका काम सरल हो जाए।
-निधि जैन