भारत में भी क्या आएगा नया कानून?
मौजूदा दौर में दुनिया में अधिकतर लोग ख़बरें और विश्लेषण सोशल मीडिया के माध्यम से ही हासिल करना पसंद करते है न कि अन्य किसी माध्यम से। बहरहाल 2.80 अरब यूज़र के साथ फ़ेसबुक दुनिया की सबसे बड़ी और शक्तिशाली टेक कंपनी है।
पिछले महीने के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में इसके सबसे अधिक 32 करोड़ यूज़र्स हैं। दूसरे नंबर पर अमेरिका है, जहाँ इसके 19 करोड़ यूज़र्स हैं। इंस्टाग्राम, वॉट्सऐप और मैसेंजर का मालिक फ़ेसबुक है और यह अरबों डॉलर की कंपनियाँ हैं, जबकि यूट्यूब गूगल की कंपनी है। दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनी फ़ेसबुक ने हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में अपने प्लेटफ़ॉर्म पर न्यूज़ का पूरी तरह बहिष्कार कर रखा है, जिसकी दुनिया भर में आलोचना हो रही है। वहीं गूगल ने भी ऑस्ट्रेलिया से निकल जाने की धमकी दी है। रिंग में एक तरफ़ जहां ऑस्ट्रेलिया की सरकार है, तो दूसरी तरफ फ़ेसबुक और गूगल जैसी टेक कंपनियाँ हैं। मुक़ाबला सख़्त है और यह कहना मुश्किल है कि जीत किसकी होगी?ऑस्ट्रेलिया की सरकार के अनुसार इस क़ानून का उद्देश्य टेक कंपनियों और न्यूज़ मीडिया के बीच समानता स्थापित करना है। हालांकि पिछले साल ऑस्ट्रेलियाई प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता आयोग की एक जाँच में यह पता चला था कि बड़े टेक दिग्गजों यानी फ़ेसबुक और गूगल ने मीडिया क्षेत्र में राजस्व और मुनाफ़े का एक भारी हिस्सा एकत्र किया है। लगभग डेढ़ साल तक चलने के बाद इस जाँच के अनुसार, ऑस्ट्रेलियाई मीडिया में डिजिटल विज्ञापन पर ख़र्च किए गए प्रत्येक 100 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में से 81 डॉलर गूगल और फ़ेसबुक की जेबों में जाता है।
आलम तो यह है कि इसी रिपोर्ट के बाद सरकार ने नया बिल बनाया है। इस बिल के पारित हो जाने के बाद मीडिया कंपनी के कंटेंट उपयोग करने के लिए फ़ेसबुक और गूगल को पैसे देने पड़ेंगे और विज्ञापन से हुई कमाई में मीडिया कंपनियों की हिस्सेदारी बढ़ानी पड़ेगी।फ़ेसबुक और गूगल के विरोध के बावजूद इस हफ़्ते ऑस्ट्रेलियाई संसद इस विवादास्पद बिल को पारित करने की तैयारी में है। संसद के निचले सदन ने इसे पहले ही पारित कर दिया है और अब उच्च सदन को इसे पारित करना है, जो विशेषज्ञों के अनुसार केवल एक औपचारिकता लगती है। अवश्य ही क़ानून का पारित होना ऑस्ट्रेलिया की सरकार और वहाँ की न्यूज़ मीडिया कंपनियों की जीत होगी। जिसका परिणाम ये हो सकता है कि दूसरे देशों में भी मीडिया कंपनियाँ इसी तरह के क़ानून पारित कराने पर अपनी सरकारों को मजबूर कर सकती हैं लेकिन बढ़ा सवाल ये है कि क्या भारत में भी ऐसा ही होगा?
-निधि जैन