जमीनी हकीकत कुछ ओर ही

 हर तरफ धुँआ ही धुँआ हैं, राख है, कालिख है। ना जाने यह दुनिया को क्या हो रहा हैं। जहर उगलती चिमनिया, भांप उगलता इंजन, प्रतिदिन दिल जहरीली हवा लेने को धड़क रहा हैं, हर जीव बिन पानी तड़प रहा हैं, नया युग आधुनिकता के नाम पर अपने कर्मों से प्रदूषण फैला रहा हैं। हजारों में ही कोई होगा जो इसका निवारण कर रहा होगा।

आलम यह है कि भारत सरकार ने जनवरी 2019 में नैशनल क्लीन ऐयर प्रोग्राम की शुरुआत की थी जिसके तहत वर्ष 2024 तक प्रदूषण के स्तर में तीस से चालीस प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन दो साल पूरे होने वाले हैं परन्तु अभी तक भारत इस लक्ष्य के आस-पास भी नहीं पहुंच पाया हैं। बीते कई दिनों से ही दिल्ली और आस पास के शहरों में प्रदूषण ने इस मौसम का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। रोजगार ऐक्यूआई बढ़ता जा रहा हैं। कोरोना के साथ-साथ लोगों को अब इस ओर भयंकर आपदा से जूझना पड़ रहा हैं और आगे भी अभी निपटना पड़ेगा। लगातार दिल्ली में कोरोना के केस बढ़ रहे है, ऐसे में इस दौरान लोगों को कई चीजों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। कोरोना के साथ अब जहरीली गैसे भी लोगों के शरीर में प्रवेश करके उन्हें बीमार बना रही है।
हवा में प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया है, ऐसे में जरूरी है कि जनता अपनी डाइट में ऐसी चीजों का सेवन करें, जो फेफड़ों को साफ करें क्योंकि वायु प्रदूषण सबसे पहले फेफड़ों पर ही असर डालती है तथा राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण यानी एनजीटी ने भी प्रदूषण को देखते हुए दिल्ली-एनसीआर व अन्य राज्यों में तीस नवंबर तक पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लागू कर दिया है। इसके अनुसार, इस दौरान पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लागू रहेगा। एनजीटी का पटाखों पर लगाया गया प्रतिबंध देश के हर उस शहर और कस्बे पर लागू होगा जहां नवंबर के महीने में वायु गुणवत्ता खराब या उससे ऊपर की श्रेणी में दर्ज की गई। दिल्ली में पटाखों की बिक्री के लिए जारी सभी लाइसेंस सस्पेंड कर दिये हैं, पुलिस को पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लागू कराने का निर्देश भी जारी हो गया हैं। एनजीटी की तरफ से यह कदम खतरनाक स्तर पर पहुंचे वायु प्रदूषण और दिवाली के बाद होने वाली स्थिति को देखते हुए उठाया गया है। एनजीटी का यह आदेश दिल्ली और आसपास के कम से कम दर्जन भर जिलों में लागू होगा। जो प्रदूषण की स्थिति को देखते हुए उचित भी है।
एनजीटी ने इसके साथ-साथ सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों को सभी स्रोतों से होने वाले वायु प्रदूषण को नियंत्रण में करने के लिए पहल शुरू करने का निर्देश दिया है क्योंकि प्रदूषण से संभावित रूप से कोविड-19 के मामले बढ़ सकते हैं।
इसके अलावा राज्यों को आदेश दिये गए है कि उन्हें जब लगे कि जिन शहरों, कस्बों में वायु की गुणवत्ता मध्यम या उससे नीचे है, वहां केवल हरे रंग के पटाखे बेचे जा सकते हैं। वहीं, इन पटाखों को दीपावली, छठ,नव वर्ष, क्रिसमस की पूर्व संध्या जैसे त्योहारों के दौरान पटाखे के उपयोग और फटने के समय को दो घंटे तक सीमित रखा जाने का भी फैसला लिया गया है। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी ड़ब्लूएचओ ने इस वर्ष मई में प्रदूषित शहरों को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी। जिस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के टॉप बीस सबसे प्रदूषित शहरों में से 13 भारत के ही हैं और सबसे भयावह यह है कि उन टॉप दस में से नौ हमारे शहर ही हैं। ड़ब्लूएचओ ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि इन शहरों में पीएम 2.5 की सालाना सघनता सबसे अधिक है। पीएम 2.5 प्रदूषण में शामिल वो सूक्ष्म तत्व होते हैं जिसे मानव शरीर के लिए सबसे खतरनाक माने जाते है।इसका सप्षट मतलब है कि दुनिया के हर दस में से नौ लोग काफी प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं। इसके अनुसार, हर साल घर के बाहर और घरेलू वायु प्रदूषण के कारण दुनिया भर में 70 लाख लोगों की मौत होती है। अकेले बाहरी प्रदूषण से 2016 में मरने वाले लोगों की संख्या 42 लाख के करीब थी, जबकि घरेलू वायु प्रदूषणों से होने वाली मौतों की संख्या 38 लाख है।
वायु प्रदूषण के कारण हार्ट संबंधित बीमारी, सांस की बीमारी और अन्य बीमारियों से मौत भी हो जाती है कई लोगों की एंव ठंड का मौसम आते ही प्रदूषण का विकराल रूप हमारे शहरों में दिखने लगता है। जो ठंड के साथ-साथ लोगों की मुश्किलें भी बढ़ा देता है, हालांकि सरकार तमाम प्रयास तो कर ही रही है प्रदूषण कम करने के लिए व तमाम दावें भी किए जा रहे है लेकिन सरकार की कथनी व करनी में जमीन आसमान के फ़ासले नजर आ रहें हैं। वैसे इस प्रदूषण में पराली जलाए जाने की हिस्सेदारी चालीस प्रतिशत से अधिक है। हर साल सर्दियां आते ही उत्तर भारत के कई राज्यों में किसान पराली जलाने लगते हैं। इस पराली से निकला धुआं उत्तर भारत के करोड़ों लोगों की सांसों को छीनने लगता है। सर्दियों की शुरुआत में पंजाब और हरियाणा के खेतों में फसल के अवशेष यानी पराली और खर-पतवार को हटाने का काम शुरू हो जाता है। किसानों को धान के बाद 15 से 20 दिनों में गेहूं की फसल लगानी होती है, इसके लिए खेतों से पराली को जल्द हटाना होता है व पराली में आग लगाने की वजह से, खेत पूरी तरह से साफ हो जाते हैं लेकिन यह जलते हुए खेत और उनसे निकलने वाला धुआं, हवा में जहर फैलाने का काम करता है। किसानों के लिए पराली को हटाने के दूसरे तरीके अपनाना मुश्किल है और अगर इसमें मजदूरों की मदद ली जाए तो गरीब किसानों के लिए खेती का खर्च बढ़ जाएगा एंव नई टेक्नोलॉजी की सहायता से खेतों में पराली को नष्ट करना आसान है परन्तु ऐसा करने वाली मशीनें बहुत महंगी हैं। जो किसान खरीदने के बारे में तो सोच भी नहीं सकते।
हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि हर वर्ष पराली जलाई जाती है लेकिन राज्य सरकारें पहले से इसकी तैयारी नहीं करती हैं, इसे रोकने के लिए किसानों को समय रहते सब्सिडी या मशीनें नहीं दी जाती। अगर सरकार इन सबका पुख्ता इंतजाम कर ले तो किसान को भी पराली जलानी नही पड़ेगी। साल 2020 में सिर्फ पंजाब में ही 66 लाख एकड़ में धान की फसल उगाई गई है। जो इलाका दिल्ली जैसे 18 शहरों के बराबर है। पंजाब को देश का अन्नदाता कहा जाता है लेकिन एक बड़ा विरोधाभास ये भी है कि वहां के खेतों से हमारा पेट भरनेवाले अन्न के साथ-साथ हमारे फेफड़ों को सजा देने वाला धुआं भी आता है। अक्सर पराली जलाने की समस्या का जिम्मेदार सिर्फ किसानों को ही बताया जाता है लेकिन वह भी करे तो क्या करें वहभी मजबूर हैं।
कई दिनों से पूरे उत्तर भारत की सांसे उखड़ी उखड़ी सी हैं व नवंबर में तो प्रदूषण के स्तर ने पिछले साल का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है। देश की राजधानी दिल्ली समेत पूरे उत्तर भारत में प्रदूषण इतना जानलेवा हो गया है, कि पराली से होने वाले प्रदूषण की सबसे बड़ी तोहमत पंजाब के किसानों पर लगती है लेकिन पंजाब के खेतों में पराली जलाने वाले किसानों का कहना है कि वह ऐसा अपनी खुशी से नहीं, बल्कि मजबूरी में करते हैं क्योंकि, पराली जलाने से रोकने के लिए सरकार ने किसानों को जो मशीने और सुविधाएं देने का वादा किया था, वो आजतक इन्हें नसीब नहीं हुई हैं।
पंजाब के मनसा के उल्लक गांव के किसानों के खेतों में उगने वाला अन्न भले ही अन्नदाताओं के बच्चों के पेट में सबसे पहले जाए या ना जाए लेकिन इनके बच्चे ही सबसे पहले इस जहरीले धुएं का शिकार होते हैं। किसानो का कहना है कि पराली जलाने से धुंआ उठ रहा है वो पहले हमें, हमारे बच्चों और गांव को प्रदूषित करता है तो ऐसे में हम भी तो विवश हैं। पंजाब में इस साल 66 लाख एकड़ इलाके में धान उगाया गया है। यह धान अन्न के रूप में देशभर के करोड़ों लोगों के पेट में जाएंगा लेकिन थाली में पहुंचने से पहले, पराली की आग के रूप में उठा धुआं उत्तर भारत के करोड़ों लोगों को गंभीर बीमारियों के एक कदम करीब ले आया। पंजाब में इस साल पिछले वर्ष के मुकाबले पराली जलाए जाने के 5 गुना ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। किसान पराली न जला पाएं। इसके लिए 8 हजार नोडल ऑफिसर्स की भी तैनाती की गई है। पंजाब में 1980 के दशक में मशीनों से खेती करने की शुरुआत हुई थी और जब से ही धान जैसी फसल की खेती मशीनों की मदद से की जाती है तो इन्हें काटने पर जो पराली बच जाती है, वो आकार में 1 से 2 फीट तक लंबी होती है जबकि जब हाथ से फसल काटी जाती है तो उसमें बची पराली का आकार 6 इंच से भी छोटा होता है।
दूसरी समस्या यह है कि जो पराली बचती है उसे प्राकृतिक रूप से डिकंपोज़ होने में लंबा समय लगता है और तब तक दूसरी फसल बोने का समय भी आ जाता है इसलिए किसान इसे जलाकर जल्दी से अपने खेतों को दूसरी फसल के लिए तैयार कर लेते हैं। किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए जो विकल्प और मशीनें सरकार ने देने का वादा किया है, उनका खर्च कर्ज के तले दबे किसानों को भारी पड़ता है। किसानों की बातों में बेशक दम हैं क्योंकि खुद अधिकारी मानते हैं कि पराली को जलाने से रोकने के लिए जो मशीनें किसानों को दी जानी थीं, उनके लिए किसानों से अर्जियां देर से मांगी गई हैं। एक समय पर पंजाब धान की खेती के लिए नहीं जाना जाता था परन्तु अब पंजाब में बड़े पैमाने पर धान उगाया जाता है। किसानों का कहना है कि अगर वह पराली न जलाएं तो मिट्टी में मिलने के बाद उसमें कीड़े हो जाते हैं और यह कीड़े दूसरी फसल के लिए जमीन को खराब कर देते हैं।
गौरतलब है कि पराली जलाने से स्वास्थ्य के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर पड़ता है और यह नुकसान 2 लाख करोड़ रुपए के आस पास का है। सरकार को भी यह पता है कि पराली के जलाने से न सिर्फ स्वास्थ्य का नुकसान हो रहा है, बल्कि जमीन की गुणवत्ता भी घटती रही है। पराली एक परेशानी है तो इस समस्या का हल भी सरकारों और किसानों को मिलकर खोजना होगा क्योंकि अगर पराली ऐसे ही जलती रही तो देश में अन्न तो उगता रहेगा लेकिन उस अन्न को खाने वाले इस जहरीले धुएं से बीमार और बहुत बीमार हो चुके होंगे। बहरहाल यह हम पर निर्भर है कि हमें पर्यावरण बचाकर एक से हजार होना है या अपने साथ नई पीढ़ी का भी दम घोटना हैं।
-निधि जैन

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