भाग्यनगर की कहानी
ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम यानी जीएचएमसी के चुनावी नतीजों के बाद इन चुनावों की चर्चा पूरे देश में हो रही है। यह देश के एक आम से शहर में हुआ, आम सा नगर निगम चुनाव है जिसमें आम तौर पर नगर निगम चुनाव सड़क, सीवर, नाली और पानी जैसे मुद्दों तक सीमित रहते हैं लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव भारत की राजनीति पर पड़ सकते हैं इसलिए ही नगर निगम चुनाव के प्रचार में निज़ाम कल्चर, राष्ट्रवाद, रोहिंग्या मुसलमान, जिन्ना, सर्जिकल स्ट्राइक, परिवारवाद और हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर किए जाने की बातें हुईं।
चुनाव प्रचार के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर किए जाने की बात कही थी। प्रचार के दौरान बीजेपी ने निज़ाम संस्कृति ख़त्म कर हैदराबाद को मिनी इंडिया बनाने की भी बात कही थी। चुनाव के प्रचार के दौरान जो मुद्दे और शब्द सामने आए थे उनमें सबसे ज्यादा चारमीनार और भाग्य लक्ष्मी मंदिर की बात कही गई थी। जो मंदिर कि हैदराबाद की मशहूर चारमीनार के पास है। गृह मंत्री अमित शाह जब चुनाव प्रचार करने पहुंचे थे तो, तब सबसे पहले वो भाग्य लक्ष्मी मंदिर गए थे एंव ऐसी मान्यता भी है कि इसी मंदिर के नाम पर ही हैदराबाद का नाम पहले भाग्यनगर था। वर्ष 1947 में जब ब्रिटिश भारत छोड़ रहे थे, तो तब वहां की तीन रियासतें कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद भारत में अपना विलय नहीं चाहती थीं। उस समय आबादी और जीडीपी के हिसाब से हैदराबाद भारत की सबसे बड़ी रियासत थी व हैदराबाद की अस्सी प्रतिशत आबादी हिंदू ही थी लेकिन अल्पसंख्यक मुसलमान वहां प्रशासन और सेना में महत्वपूर्ण पदों पर थे।
जिससे तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस मसले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना चाहते थे परन्तु गृह मंत्री सरदार पटेल ने इस अराजकता पर रोक लगाने का फैसला किया और 13 सितंबर 1948 को हैदराबाद का भारत में विलय करने के लिए ऑपरेशन पोलो आरंभ कर दिया और सिर्फ़ 100 घंटों के सैन्य अभियान के बाद ही हैदराबाद, भारत का हिस्सा बन गया। आजादी से पहले हैदराबाद के निज़ाम का खज़ाना पूरी दुनिया में मशहूर था। वर्ष 1937 में अमेरिका की टाइम मैगज़ीन के कवर पेज पर निज़ाम की तस्वीर छापी गई थी और तब उन्हें दुनिया का सबसे अमीर इंसान बताया गया था। हैदराबाद के आख़िरी निज़ाम नवाब मीर उस्मान अली ख़ान के पास दुनिया का सातवां सबसे बड़ा हीरा जैकब डायमंड भी था। 184 कैरेट के इस हीरे की कीमत कई सौ करोड़ रुपये होने का दावा किया जाता है लेकिन निज़ाम इस हीरे को पेपर वेट की तरह इस्तेमाल करते थे।
कहा जाता था कि निज़ाम के पास असली मोतियों का इतना बड़ा खज़ाना था कि अगर उन्हें सड़क पर बिछा दें तो वह कई किलोमीटर के इलाके को घेर सकते थे।15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ था तो तब भारत से जाते वक्त अंग्रेज़ों ने कहा था कि 15 वर्षों में भी कोई भारत की 565 रियासतों को जोड़ नहीं सकता परन्तु सरदार पटेल ने सिर्फ़ 2 वर्षों के अंदर पूरे भारत को एक सूत्र में बांध दिया था। जो बिल्कुल भी आसान नहीं था क्योंकि, आज़ादी से पहले भारत के एक बड़े हिस्से पर अंग्रेज़ों की सीधी हुक़ूमत थी व दूसरा हिस्सा वो था, जिस पर राजाओं और रजवाड़ों की हुक़ूमत थी। यह ऐसी रियासतें थीं, जो ब्रिटेन की महारानी की गुलामी स्वीकार कर चुकी थीं। और इनमें से कई राजाओं के पास अपनी सेनाएं और कुछ के पास तो लड़ाकू विमान भी थे लेकिन सरदार पटेल ने अपनी कूटनीति से हैदराबाद के नवाब को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था। बहरहाल आज के दौर में हैदराबाद को निज़ाम संस्कृति से मुक्त होना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि, हैदराबाद एक तेज़ी से उभरता हुआ शहर है व निज़ामों के तौर तरीकों से इस शहर को चलाना इस शहर के विकास के लिए घातक है। हैदराबाद वह शहर है जहां पर दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियां जैसे माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, अमेजन, और गूगल के ऑफिस हैं तथा उत्पादन के लिहाज़ से हैदराबाद में देश की एक तिहाई दवाईयां बनती हैं।
और तो और हैदराबाद देश की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला शहर है जिसकी कुल जीडीपी करीब साढ़े 5 लाख करोड़ रुपए थी। जिसके लिए हैदराबाद का ओर विकास होना अनिवार्य हैं।
-निधि जैन