बोर्ड परीक्षा, नया पैटर्न और टेंशन- कैसे मिलेगा छात्रों को ग्रेजुएशन में दाखिला?
बारहवीं के इम्तिहान में 90 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल करने पर भी दिल्ली यूनिवर्सिटी के नामी कॉलेजों में पढ़ने का अवसर नहीं मिल पाता है। लगभग हर विषय में अधिकतम कटऑफ 99 प्रतिशत जाती है या उससे भी अधिक, जिस कारण दिल्ली यूनिवर्सिटी के तमाम कॉलेजों में छात्र-छात्राओं को दाखिले नहीं मिलता है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिले की उम्मीद में ऐसे ही हजारों छात्र कटऑफ के बाद हताश हो जाते हैं जबकि उनमें प्रतिभा की कमी नहीं होती। मजबूरन तब उन्हें अपना विषय बदलना पड़ता है। हजारों छात्र देशभर में हर साल दाखिले के लिए इस तरह की कटऑफ का सामना करते हैं लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।2022-23 शैक्षणिक सत्र से यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) ने अंडर ग्रेजुएट कोर्स में दाखिला लेने की पुरानी व्यवस्था को बदल दिया है। अब देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ग्रेजुएशन में दाखिला लेने के लिए बारहवीं बोर्ड में प्राप्त अंकों को वरीयता नहीं दी जाएगी बल्कि न्यूनतम अंकों की जरूरत जरूर पड़ेगी। यूजीसी ने विश्वविद्यालय संयुक्त प्रवेश परीक्षा की व्यवस्था की है। ये एक कॉमन टेस्ट होगा। जिसमें प्राप्त अंकों के आधार पर छात्र, देश के किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय में दाखिला ले सकेंगे। इसमें बारहवीं के नंबरों को वेटेज नहीं दिया जाएगा। 2022-23 शैक्षणिक सत्र से विश्वविद्यालय संयुक्त प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) का आयोजन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी करेगी। ये परीक्षा कंप्यूटर बेस्ड होगी, जिसमें छात्रों को सेंटर पर जाकर कंप्यूटर की मदद से मल्टीपल च्वॉइस सवालों का जवाब देना होगा। परीक्षा का पाठ्यक्रम, एनसीईआरटी के 12वीं कक्षा के सिलेबस से मिलता-जुलता ही होगा। विश्वविद्यालय संयुक्त प्रवेश परीक्षा 13 भाषाओं में होगी। छात्र अपनी पसंद की भाषा का चयन कर इस परीक्षा को दे सकते हैं। इनमें अंग्रेजी, हिंदी, असमिया, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, ओड़िया, पंजाबी, तमिल, तेलुगु और उर्दू भाषा शामिल है। एक छात्र ज्यादा से ज्यादा 6 विषयों के लिए परीक्षा दे सकते है और नंबरों के आधार पर छात्रों को केंद्रीय विश्वविद्यालय के अंडर ग्रेजुएट कोर्स में दाखिला मिलेगा। अलग-अलग केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए अब अलग-अलग प्रवेश परीक्षा नहीं देनी होगी। छात्र एक कॉमन टेस्ट की मदद से देश के किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय के अंडर ग्रेजुएट कोर्स में दाखिला ले पाएंगे। इससे छात्रों को फायदा होगा। कॉमन टेस्ट होने से बच्चों को एक समान मौका मिलेगा। वहीं देश के अलग अलग राज्यों के बच्चे अपनी-अपनी पसंद की भाषा में इस परीक्षा को दे पाएंगे। हालांकि पहले भी कुछ 10-15 सेंट्रल यूनिवर्सिटी मिलकर एक कॉमन टेस्ट लेती थी लेकिन वो सिर्फ अंग्रेजी में परीक्षा होती थी। गौरतलब है कि राजस्थान और हरियाणा का बच्चा, जब हिंदी में पढ़ाई करता है तो वो अंग्रेजी में परीक्षा कैसे दे सकेगा? लेकिन अब कॉमन टेस्ट में भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं होना होगा, जिससे सभी छात्रों के एक समान अवसर मिलेगा। परन्तु जब देश भर में लाखों बच्चे इस परीक्षा को देंगे तो इस परीक्षा को केवल 13 भाषाओं तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि अधिक से अधिक भाषाओं में पेपर देने की सुविधा हो। जिससे बच्चों को इसका लाभ मिले।
बहरहाल, एक तरफ जहां लोग इस नए फैसले का सम्मान कर रहें है वहीं दूसरी तरफ कुछ जानकार इसे विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता पर भी खतरा बता रहे हैं। उनका कहना है कि कई यूनिवर्सिटी में अंदर डेप्रिवेशन प्वाइंट की व्यवस्था है। जिसके तहत चार कैटेगरी में आने वाले बच्चों को डेप्रिवेशन पॉइंट दिए जाते हैं। इसका मकसद होता है पिछड़े इलाकों से आने वाले बच्चे, अच्छी जगह से पढ़ाई करने वालों की तुलना में पीछे ना छूट जाएं। ये प्वाइंट पिछड़े जिलों से पढ़ाई करने वाले, कश्मीरी माइग्रेंट, डिफेंस कैटेगरी के तहत आने वाले बच्चों और लड़कियों को दिए जाते हैं। हर कैटेगरी में पांच प्वाइंट की व्यवस्था है। छात्र ज्यादा से ज्यादा 10 पॉइंट तक ले सकता है। इन प्वाइंट की मदद से पिछड़े इलाकों से आने वाले बच्चों को यूनिवर्सिटी में दाखिला मिलने में मदद मिलती है लेकिन अब उन लोगों का मानना है कि कॉमन टेस्ट के आने से कॉलेजों की ये व्यवस्था का क्या होगा?बहरहाल, जहां हमेशा ही सरकार के किसी फैसले के लिए प्रशंसा होती है तो वहीं आलोचना भी की जाती है। ठीक इसी तरह इस फैसले पर भी विपक्षी दल हमलावर है तो वहीं सरकार के लिए यह सराहनीय कदम है।