पहले भी छह वर्ष तक हुआ था आंदोलन!

 नए कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे किसान दिल्ली के तमाम बॉर्डर पर डटे हुए हैं। किसान नए कृषि कानून रद्द करने की मांग कर रहे हैं। हालांकि किसान और सरकार के बीच छह दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। वहीं किसानों के आंदोलन की वजह से आम लोगों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हैं। किसान आंदोलन की वजह से लुधियाना के होजरी उघोग को नुकसान हो रहा है। गौरतलब है कि ऐसा किसान आंदोलन देश में पहली बार नहीं हो रहा है ऐसा ही एक आंदोलन महाराष्ट्र में छह साल तक किसानों का चला था। उन छह सालों में शामिल किसी किसानों ने खेती नहीं की थी, जिसकी वजह से भुखमरी की नौबत तक आ गई थी लेकिन किसान अपने रुख पर कायम रहे।महाराष्ट्र का वह किसान आंदोलन एक इतिहास बन चुका है, जिसे चारी किसान हड़ताल के नाम से जाना जाता हैं।महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में खोटी व्यवस्था के ख़िलाफ़ किसानों का यह आंदोलन चला था। यह हड़ताल पहली बार रायगड ज़िले के अलीबाग के नज़दीक चारी गांव में हुई थी। जिसके कारण महाराष्ट्र में कृषि क्षेत्र में कई अहम बदलाव हुए थे। बाबा साहब भीम राव आंबेडकर ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया था। वहीं किसानों और मजदूरों के नेता नारायण नागु पाटिल ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया था और अंग्रेजों को घुटने पर आने तक के लिए मजबूर कर दिया था। हालांकि इस आंदोलन की वजह से महाराष्ट्र में बटाईदार क़ानून भी लागू करना पढ़ा था। दरअसल खोट लोग किसानों को बरगला कर रखते थे क्योंकि वह लोग पढ़े-लिखे नहीं थे व खोट लोगों ने काबुलायत जैसी व्यवस्था शुरू की थी। जिस व्यवस्था के अंदर 11 महीने के लिए खेत ठेके पर दिए जाते थे एंव खोट लोग एक एकड़ ज़मीन के बदले एक खांडी चावल की मांग करते थे और अगर कोई किसान नहीं दे पाता था तो उससे अगले साल इसका डेढ़ गुना लिया जाता था। हालांकि जी तोड़ मेहनत करके भी किसानों के हाथ कुछ नहीं आता था तथा किराए पर दिए गए ज़मीन पर पूरे समुदाय का हक़ होता था लेकिन खोट इस पर अपना मालिकाना हक़ जताते थे। 19वीं सदी के अंत में खोटी व्यवस्था को कई जगहों पर चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी। 1921 से 1923 के बीच रायगढ़ में खोट लोगों के ख़िलाफ़ अलग-अलग स्तरों पर आंदोलन हुए परन्तु वह सभी आंदोलन कुचल दिए गए। कोंकण क्षेत्र किसान संघ 1927 में खोट व्यवस्था के ख़िलाफ़ बना था। भाई अनंत चित्रे इस संघ के सचिव थे। इस संघ ने खोटी व्यवस्था के ख़िलाफ़ रत्नागिरी और रायगढ़ जिले में कई रैलियां निकालीं। रैलियों को नाकाम करने के कई प्रयास हुए। कई बार नारायण नागु पाटिल और भाई अनंत चित्रे को रैली को संबोधित करने पर पाबंदी लगा दी गई परन्तु दिन प्रतिदिन किसानों का समर्थन बढ़ता रहा। हड़तालों को लेकर पेन तहसील में 25 दिसंबर 1930 को एक अहम सम्मेलन आयोजित किया गया। जिसे कोलाबा ज़िला सम्मेलन कहा गया था। इस सम्मेलन में पारित हुए प्रस्ताव आगे चल कर आंदोलन के आधार बने। वहीं इस सम्मेलन के बाद नारायण नागु पाटिल और भाई अनंत चित्रे ने आक्रामक रुख अपनाते हुए सभी रैलियों को संबोधित करना शुरू किया और किसानों को जागरूक किया। हालांकि तब के कोबाला जिले में खेड, ताला, मनगांव, रोहा, और पेन जैसी जगहों पर हज़ारों किसानों ने रैलियाँ निकाली थी। जिसका नतीजा निकला कि खोटी व्यवस्था के ख़िलाफ़ 1933 में एक ऐतिहासिक आंदोलन हुआ। आंदोलनों को कई बार पाबंदियाँ भी झेलनी पड़ी थीं। जिसने आंदोलन को धीमा कर दिया था लेकिन 1933 में पाबंदियों के हटने के बाद 25 गांवों की एक रैली चारी गांव के पास से शुरू हुई। जिसकी वास्तविक तिथि 27 अक्टूबर 1933 थी।अलीबाग-वडखाल सड़क पर चारी गांव स्थित है और इस आंदोलन की घोषणा इसी गांव में हुई थी। इस प्रदर्शन में यह घोषणा की गई थी कि किसानों को उनके उपज में उनका वाजिब हक़ नहीं मिल रहा है। जिसके लिए वह हड़ताल पर जाएंगे और यह फैसला लिया गया कि वह खेतों में फसल नहीं उपजाएंगे।बहरहाल खोट लोगों ने जब किसानों पर हड़ताल खत्म करने का दबाव बनाया तो किसानों ने इसका ड़टकर सफलतापूर्वक मुकाबला किया परन्तु भूख से वो कैसे लड़ते जब खेती-बाड़ी ही नहीं हो रही थी तब खाने के लिए अनाज कहाँ से आता? खेती नहीं करने को लेकर यह हड़ताल 1933 से लेकर 1939 तक कुल छह सालों तक चली। जिसमें चारी के अलावा 25 और गांव शामिल हुए थे। जिन्ह सब गांवों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा था। हड़ताल के दौरान किसानों को बहुत बुरे हालात का सामना करना पड़ा था। उन्हें जंगल से लकड़ी काट कर तक गुजारा करना पड़ा था लेकिन तमाम मुश्किलों के बावजूद भी वह अपनी मांगों पर ड़टे रहें। वहीं किसानों ने अपनी मांगों को लेकर एक अख़बार भी निकाला था क्योंकि कोलाबा समाचार जैसे स्थापित अखबार ने हड़ताल को लेकर सकारात्मक रुख नहीं रख रहे थे तो तब नारायण नागु पाटिल ने लोगों की मदद से अपना अखबार शुरू किया। 5 जुलाई 1937 को कृषिवल नाम से इस अखबार की शुरुआत हुई और आज की तारीख में यह अख़बार शेतकारी कामगार पार्टी का मुखपत्र है। हालांकि किसानों की कुछ मांगें मान ली गईं और किसानों की जीत हुई परन्तु आंदोलन के दौरान हड़ताल की वजह से किसानों को कई परेशानी हो रही थी, उन्हें खाने को पर्याप्त खाना नहीं मिल पा रहा था और भी कई तरह की परेशानियाँ वो झेल रहे थे लेकिन बावजूद इसके उन्होंने अपना ये आंदोलन छह सालों तक जारी रखा। उल्लेखनीय है कि अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करना, अपनी आवाज उठाना ठीक है लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन प्रदर्शन का तरीका भी ऐसा होना चाहिए जिससे किसी को परेशानी न हो चाहें वह आंदोलनकारी हो, आम जनता हो या जिसके खिलाफ आंदोलन किया जा रहा हैं।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वर्ष 2020 की यादें

अब कावासाकी से भी लड़ना है

चीन में कोरोना की वापसी