आखिरकार आंदोलन की उम्र हैं क्या?

 दिल्ली में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। तापमान 10 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे जा चुका है लेकिन पंजाब और हरियाणा से आए किसान इसकी परवाह किए बिना दिल्ली और हरियाणा के बॉर्डर पर जमे हुए हैं।उल्लेखनीय है कि किसान छह महीनों तक विरोध-प्रदर्शन करने की तैयारी के साथ आए हैं। वहीं एक महीने तो उनको यहाँ पर विरोध-प्रदर्शन करते हुए हो भी गया हैं फिर भी वह पीछे नहीं हटते दिख रहे हैं। किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार जब तक तीन नए कृषि क़ानूनों को वापस नहीं ले लेती तब तक वह अपना विरोध जारी रखेंगे। यह उनका साफ तौर पर कहना है तथा पंजाब में किसानों के इस आंदोलन को भारी समर्थन मिल रहा है। लोग अपने-अपने अंदाज में किसान आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे हैं। वहीं आंदोलन के बीच कई किसान फसल का उचित दाम न मिलने से परेशान हैं। गोभी के बाद पंजाब में किसानों ने आलू की फसल नष्ट करना शुरू कर दिया है। पंजाब के दोआबा क्षेत्र में आलू की अधिक पैदावार होती है। बावजूद इसके फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। फसल की लागत भी नहीं निकल रही है। जिसे देखते हुए युवा किसान आलू की फसल को ट्रैक्टर से जोतवा रहें हैं। हालांकि इससे पहले पंजाब में कई जगह किसानों ने गोभी की फसल भी उचित मूल्य न मिलने पर उजाड़ दी थी। किसानों के अनुसार आलू की फसल पर करीब 60 हजार रुपये प्रति एकड़ खर्च आता है। लेकिन जिस तरह से आलू के दाम औंधे मुंह गिरे हैं, इससे तो प्रति एकड़ 25000 रुपये का उन्हें नुकसान हो रहा है और अगर वह ट्रांसपोर्ट खर्च जोड़कर आलू मंडी पहुंचाते हैं तो नुकसान और बढ़ जाएगा। यही वजह है कि किसान आलू को खेत में नष्ट करना बेहतर समझ रहें हैं। गौरतलब है कि किसानों के बढ़ते आंदोलन के कारण कई अन्य आम लोगों को तकलीफों का सामना करना पड़ रहा है। किसान संगठन पिछले एक माह से दिल्ली की दहलीजों पर अपनी मांगों को लेकर डटे हुए हैं लेकिन किसान यह भूल रहे हैं कि उनके आंदोलन के कारण दो राज्यों को जोड़ने वाला रास्ता बंद है, जिससे यातायात प्रभावित हो रहा है। इसके अलावा बॉर्डर के आसपास मौजूद बाजार, उघोग और पेट्रोल पंप पूरी तरह से थप पड़े हैं। जिसके कारण लोगों को सैलरी तक नहीं मिल रही है। हालांकि यह सरकार को भी सोचना चाहिए कि आखिरकार कब तक किसान अपनी मांगों को लेकर कड़ाके की ठंड में सड़कों पर बैठे रहेंगे, जब किसान अपनी मांगों को लेकर पीछे हटने को तैयार नहीं है तो सरकार को ही बीच का रास्ता निकाल कर किसान नेताओं से स्पष्ट रूप से बात करनी चाहिए क्योंकि रोजाना बढ़ते आंदोलन के कारण आम जनता को अधिक परेशानी हो रही हैं।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

वर्ष 2020 की यादें

अब कावासाकी से भी लड़ना है

चीन में कोरोना की वापसी