रौशनी फैलाने के नाम पर भ्रष्टाचार का जाल!

 -by Nidhi jain 

देश में घोटाले होने कोई नई बात नहीं है लेकिन कई ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दा होते है जिन्हें उतना नहीं उठाया जाता जितना की उसके गुनहगारों को दंड़ मिलना चाहिए।बहरहाल जम्मू-कश्मीर के इतिहास में भी सबसे बड़ा ऐसा ही घोटाला है, जो है रोशनी ज़मीन घोटाला।
इस समय हर कोई जम्मू-कश्मीर में रोशनी जमीन घोटाले में शामिल हुए लोगों की लिस्ट की ही चर्चा कर रहा हैं।
क्योंकि जैसे जैसे कार्रवाई आगे बढ़ रही है वैसे ही कई नेताओं, उनके रिश्तेदारों, अधिकारियों और बड़े व्यापारियों के नाम इस घोटाले में शामिल होने के सबूत मिल रहे है। गौरतलब है कि इस सोचे समक्षे घोटाले से सरकार को कई करोड़ो का नुक्सान हुआ है, जिन पैसों से हर घर में बिजली पहुंचने वाली थी, हर घर में उजाला होने वाला था आज उन्ही पैसों का कई लोग गलत उपयोग कर रहे हैं। वर्ष 2001 में फारूक अब्दुल्ला जब जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने विधानसभा में रोशनी एक्ट पास किया गया था जिसका मकसद यह था कि जिनके पास निश्चित समय के लिए सरकारी जमीन लीज पर है या कोई चालीस वर्ष से सरकारी जमीन पर रह रहा है तो यह जमीन हमेशा के लिए उन्हें दे दी जाए, मतलब उन्हें जमीन का मालिक बना दिया जाए, लेकिन उसके बदले में सरकार बाजार मूल्य पर पैसा लेगी और इस तरह जो पैसा सरकारी खजाने में आएगा उससे जम्मू-कश्मीर के हर घर-घर बिजली की योजना चलाई जाएगी और इसलिए इसे रोशनी एक्ट नाम दिया गया व इस एक्ट के ज़रिए करीब 25 हज़ार करोड़ रुपये हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था लेकिन रोशनी एक्ट कुछ खुदगर्ज़ लोगों के कारण घोटाले में बदल गया, जिससे कई लोगों ने अपने घर बनायें। जम्मू के सुंजवान में फारूक अब्दुल्ला का बंगला है। वर्ष 1998 में फारूक अब्दुल्ला ने इस बंगले को बनाने के लिए करीब 16 हजार स्क्वायर फीट जमीन खरीदी थी लेकिन उन पर आरोप है कि उन्होंने इसके आस पास की 38 हजार स्क्वायर फीट जंगल की जमीन पर भी कब्जा कर लिया। जिस पर उन्होंने अपना आलीशान बंगला बनाया। हालांकि जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने अपनी वेबसाइट पर इस प्लॉट की जानकारी नहीं दी हैं परन्तु ऐसा ही एक मामला श्रीनगर में भी सामने आया है जहां फारुक अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस का दफ्तर है, जिसमें नवा-ए-सुबह नामक एक ट्रस्ट का ऑफिस भी है। जहां वर्ष 2001 में जमीन की कीमत डेढ़ करोड़ रुपए थी लेकिन मात्र 58 लाख रुपए जमा कर जमीन हमेशा के लिए नवा-ए-सुबह ट्रस्ट के नाम करवा दी गई, जिसमें ऐसा करने में रोशनी एक्ट का इस्तेमाल किया गया लेकिन आज इस जमीन की कीमत करीब 25 करोड़ रुपए है। हालांकि नेशनल कॉन्फ्रेंस का कहना है कि उन्हें जो कीमत सरकारी विभाग ने वर्ष 2001 में बताई थी, वही जमा करके इस जमीन का मालिकाना हक हासिल किया गया था। जमीन के मार्केट रेट और सरकार को दिए गए पैसे के अंतर में ही रोशनी घोटाला छिपा है, आरोप है कि सरकार मे बैठे लोगों ने एक्ट बनाया और फिर महंगी जमीनों के सरकारी रेट बेहद कम करवा दिए व जमीनें कम कीमत पर खरीद लीं। जिससे सरकार को घाटा हुआ और घोटालेबाजों को फायदा। यह कहने में कोई संदेह नहीं है कि रोशनी एक्ट के नाम पर कानूनी तरीके से गैरकानूनी काम किया जा रहा है। हाई कोर्ट के रोशनी एक्ट को असंवैधानिक बताया गया है व सीबीआई जांच के आदेश भी दिए हैं जिसमें बड़े बड़े लोगों के नाम सामने आ रहे हैं। वैसे भी इन दिनों गुपकार गैंग जिस तरह से अनुच्छेद 370 की वापसी के लिए सक्रिय है, उससे साफ है कि यह लोग अपने वही दिन वापस चाहते हैं जिससे यह सरकारी जमीनों पर कब्जा कर सकें, राज्य के संसाधनों को लूट सकें, सरकारी बंगलों और सिक्योरिटी का इस्तेमाल कर सकें लेकिन अनुच्छेद 370 हटने के बाद शायद उनकी कोई चाल कामयाब नहीं होने वाली है तथा रोशनी घोटाले में जम्मू-कश्मीर प्रशासन जैसे जैसे नाम सार्वजनिक कर रहा है वैसे वैसे नेशनल कॉफ्रेंस, पीडीपी, और कांग्रेस के नेताओं और उनके रिश्तेदारों के नाम सामने आने लगे हैं। कई सरकारी अधिकारी, व्यापारी और कारोबारियों के नाम भी इस लिस्ट में शामिल हैं।
वर्ष 2001 में जब रोशनी एक्ट बना था तो तब जमीन पर कब्जे का कट ऑफ ईयर 1990 रखा गया था लेकिन वर्ष 2005 में मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार ने इस समय सीमा को बढ़ाकर वर्ष 2004 कर दिया था, जिसका मतलब है कि वर्ष 1990 से 2004 के बीच जिन लोगों ने सरकारी ज़मीन लीज़ पर ली उन्हें भी मालिक बनने का मौका मिल गया। नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के बाद कांग्रेस को भी तब मौका मिला जब गुलाम नबी आज़ाद वर्ष 2005 में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2007 में गुलाम नबी आज़ाद ने जमीन पर कब्जे की सीमा बढ़ाकर वर्ष 2007 कर दी थी। जिसका स्पष्ट मतलब है कि जो भी सरकार में आया उसने अपने फायदे के लिए या अपने लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए एक्ट में संशोधन किया एंव वर्ष 2013-14 में CAG की रिपोर्ट में भी यह खुलासा हुआ था कि जम्मू कश्मीर सरकार ने इससे कमाई का 25 हजार करोड़ रुपए का जो लक्ष्य रखा था, उससे सरकार को सिर्फ 76 करोड़ रुपये की कमाई हुई और जम्मू कश्मीर में रौशनी फैलाने के नाम पर भ्रष्टाचार का अंधेरा फैला दिया गया।

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