मकसद, सिर्फ जनता को सम्मोहित करना

 उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, गोवा और मणिपुर प्रदेशों में चुनावी महासंग्राम शुरू हो चुका है। हर बार की भाँति इस वर्ष भी चुनावी लड़ाई में जनता को रिझाने और बेवकूफ बनाने के लिए तमाम तरह के लुभावने वायदे, झांसे और जाल फेंके जा रहें है। सभी पार्टियों का प्रयास है कि जनता को सम्मोहित कर प्रदेश की बागडोर हमें मिल जाए। हालांकि बात तो सिर्फ सेवा की ही की जाती है लेकिन इस सेवा को करने के लिए साम, दाम, दण्ड और भेद सभी हथकंडे अपनाये जाते हैं।

वैसे भी जहाँ सेवा भावना होती है, वहां इतनी मारामारी नहीं होती अर्थात जब हम इस उद्देश्य के साथ जुड़े होते है कि हमें सिर्फ कुछ देना ही है तो फिर इतनी राजनैतिक पैंतरेबाजी की क्या जरूरत है?
विश्व का इतिहास इस बात का साक्षी है कि नियति की व्यवस्था को छोड़कर सभी मानवीय समस्याओं का शत् प्रतिशत निदान संभव है और विश्व के अनेक देश इस दिशा में अपना बेहतर उदाहरण भी प्रस्तुत कर चुके है लेकिन हमारे देश में वही बुनियादी समस्याएं जैसे गरीबी, जनसंख्या और बेरोजगारी दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है जिसके निदान का रस्ता अभी तक अंधकार में है। इन अनेक मुद्दों के नाम पर बड़ी-बड़ी योजनाएं बनाई जाती है और भारी धन काव्य किया जाता है लेकिन जिस तरह बुनियादी तौर पर इन योजनाओं को लागू करने के प्रयास की आवश्यकता है, वह नहीं हो पाता है और उसका नतीजा यह हुआ कि धनराशि का भारी अंश भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया तथा उक्त समस्याएं कम होने की जगह बढ़ती गयी और आज भी बढ़ती जा रही है।
गौरतलब है कि चुनाव की तारीखों के निकट आते ही तमाम नेता विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के अपने काम गिनवाने लग जातें है और जनता के हितेशी बन जाते है लेकिन वास्तव में अगर यह नेता इतने ही हितैषी है आम जनमानस के तो लोकलुभावन स्कीमों की चुनाव के वक्त क्यों घोषणा करते हैं? क्या इससे पूर्व यह लागू कर जनता को राहत नहीं दी जा सकती है? इन तमाम पहलुओं पर देश की जनता को चिन्तन करने की जरूरत है क्योंकि जब तक जनता स्वयं जागरूक नहीं होगी तब तक देश के राजनेताओं द्वारा गरीबों, असहायों का शोषण जारी रहेंगा।
बहरहाल देश की राजनैतिक पार्टियों को अब देशहित और देश की जनता के हित में बुनियादी आधार पर कार्य करना चाहिए। देश सबल और सुदृढ़ तभी होगा जब देश की जनता का जीवन स्तर ऊपर उड़ेगा और उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी। इसके लिए सिर्फ एक बार ईमानदारी से कोशिश करने की आवश्यकता है और यह सिर्फ राजनीति के माध्यम से राजनेता के द्वारा ही संभव है। राजनीति का जीवन देश पर निर्भर है। अतः हमारे नेताओं को आत्ममंथन की जरूरत है।
-निधि जैन