भावनाएं हीन भाषाएं!
-By Nidhi Jain भारत में जहां औसतन 20 किलोमीटर के बाद भाषा और बोलियां बदल जाती हैं, वहीं अंग्रेज़ी भाषा का तो फ्यूचर ब्राइट नज़र आ रहा है, लेकिन भारतीय भाषाओं के मामले में यह स्थिति बहुत ख़राब है। 21 फरवरी को दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया था। वर्ष 1999 में पहली बार संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNESCO ने इसे मनाने की घोषणा की थी और वर्ष 2000 से हर साल ये एक दिन मातृभाषा को समर्पित होता है परन्तु आज का कड़वा सच तो ये है कि हर 14 दिन में दुनिया में एक भाषा विलुप्त हो जाती है। हमारे देश में बच्चों को अंग्रेज़ी की कविता तो याद रहती है, लेकिन वो ही अपनी मातृभाषा में बोली जाने वाले कहानियों और कविताओं को याद नहीं रखते। अंग्रेज़ी बोलना, पढ़ना और लिखना एक स्टेटस सिंबल बन गया है। हिन्दी के नमस्ते से ज़्यादा हमें अंग्रेज़ी का शब्द हैलो बोलना अच्छा और कूल लगता है। वहीं हमारे ही समाज में ये बातें भी बोली जाती हैं कि अंग्रेज़ी सीख ली तो नौकरी भी मिल जाएगी और सम्मान भी जिसका स्पष्ट मतलब है कि आज अगर भाषाओं का विश्वयुद्ध हुआ तो भारत की हिन्दी, मराठी, गुजराती, बांग्ला, पंज...